Betul News:अध्याय 2 थाना मिलते ही सायरन नहीं, अपराध गूंजता है!

जहाँ साहब जाते हैं, वहाँ जुए-सट्टे वाले पहले से टेंट लगा लेते हैं!

अध्याय 2 थाना मिलते ही सायरन नहीं, अपराध गूंजता है!

जहाँ साहब जाते हैं, वहाँ जुए-सट्टे वाले पहले से टेंट लगा लेते हैं!

बैतूल :- शहर की एक प्रतिष्ठित होटल में चल रही गुफ्तगू ने पुलिस विभाग की “पारदर्शिता” की पारदर्शिता ऐसी दिखाई कि दीवारों के भी कान खड़े हो गए। चर्चा का विषय कोई मिर्ची भजिया नहीं, बल्कि एक ‘चमत्कारी’ थाना प्रभारी थे, जिनके कदम पड़ते ही अपराधियों की लॉटरी लग जाती है और इलाके में अपराध की फसल लहलहाने लगती है।

साहब का ट्रैक रिकॉर्ड – ‘ज्योतिषियों’ को भी शर्मिंदा कर दे!

कहते हैं कि कुछ लोग जहां जाते हैं, वहां विकास होता है… लेकिन साहब जहां जाते हैं, वहां विकृत विकास होता है! उनकी पोस्टिंग होते ही क्षेत्र में जुए-सट्टे के अड्डों की गूगल मैप पर भी लोकेशन अपडेट हो जाती है। स्थानीय लोगों ने तो अब कहना शुरू कर दिया है – “थाना प्रभारी नहीं, अपराध विस्तार अधिकारी हैं साहब!”

जहाँ जुए का खेल, वहाँ साहब का मेल!

सूत्रों के अनुसार, साहब की कार्यशैली ऐसी है कि अपराधी भी उन्हें ‘प्यारे साहब’ कहकर पुकारते हैं। जुए के अड्डे ऐसे फलते-फूलते हैं मानो साहब ने खुद नींव रखी हो। कुछ लोगों का तो यह भी दावा है कि साहब की उपस्थिति में जुआ इतना सुरक्षित होता है कि इन्वेस्टर तक कहने लगे 100% है!”

प्रशासन के पास मजबूरी का नाम – ‘फील्डिंग एक्सपर्ट

वरिष्ठ अधिकारियों की भी हालत अब फील्डिंग जमाने वाले क्रिकेट कोच जैसी हो गई है – खिलाड़ी भले गेंद छोड़ दे, लेकिन टीम में रखना जरूरी है! विभाग में थाना प्रभारियों की भारी कमी का हवाला देकर साहब को लगातार फील्ड में बनाए रखना अब प्रशासनिक ‘मजबूरी’ बन चुकी है। सूत्र बताते हैं कि साहब न लाइन में हैं, न लाइन से बाहर — वो तो बस ‘फील्ड के हीरो’ हैं।साहब की “मिलन सारता ऐसी है कि अपराधी भी उनके ट्रांसफर से पहले मिठाई बांट देते हैं – साहब आ रहे हैं, अब तो पार्टी पक्की है! जुए के खिलाड़ी, सट्टा प्रेमी और अवैध धंधों के डीलर अब पोस्टिंग सूची ऐसे पढ़ते हैं जैसे फिल्म की कास्टिंग लिस्ट, और साहब का नाम दिखते ही इलाका जगमगा उठता है।अब आम लोग सोशल मीडिया पर मीम बनाकर पूछ रहे हैं — “थाना बदलेगा या अब क्राइम ही न्यू नॉर्मल है?” वहीं कुछ व्यंग्यकारों ने नया नारा दिया है – “जहाँ साहब, वहाँ धंधा साफ़!हर गली में होगा खेल, साहब के रहते कोई नहीं फेल!”जनता अब यह जानना चाहती है कि यह संयोग है, प्रयोग है या कोई ‘गहरा संज्ञान’? साहब का नाम अपराधियों की बुकिंग डायरी में ‘फेवरेट ऑफिशियल’ के रूप में छपा हुआ है। लेकिन सवाल यही है – पुलिसिंग का यह नया मॉडल किस दिशा में जा रहा है – अपराध की तरफ या प्रशासन की मजबूरी के गड्ढे में?

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