diminishing our reality:क्यों हम आज की भौतिकता में अपनी वस्तविकता क्षीण करते जा रहे हैं….??
क्यों हम आज की भौतिकता में अपनी वस्तविकता क्षीण करते जा रहे हैं….??

बैतूल। विकास की अवधारणा चाहे कितनी भी सुंदर हो लेकिन कभी कभी भावनात्मक रूप से घुटन से भरी भी होने लगती है खासकर उनके लिए जो किसी भी स्थान, व्यक्ति या संस्कृति के प्रति थोड़े ही समय मे लगाव से भर जाते है। विकास नई सोच और चमक से भरा तो होता है लेकिन पुरानी चीजो को बस यादें बनाकर छोड़ देता है, कई बार विकास होने के बाद हम भूलवश इतने आगे बढ़ जाते है कि नुकसान और सामाजिक हानि का अंदाजा काफी समय बाद हमे लगता है तब हमारे आस पास हम किसी को खड़ा नही पाते, अकेलापन महसूस करने लगते है और पुरानी चीजो को पाने के लिए तड़पने लगते है। ख्वाइश करने लगते है उन्ही पुरानी चीजो को पाने की। मुझे यह तो नही पता कि विकास की सही सीढ़ी क्या हो जो सभी ऐसे इंसानों को खुश रखे लेकिन हमे संस्कृति , स्थान और व्यक्ति के मानवीय मूल्यों को तो उसी हद तक विकसित करना चाहिए जिस हद तक हम सहनशील और सहिष्णु बन सके।
लेखक आरती कंगाले(असिस्टेंट लेक्चरर शिक्षा- बी.ए/एम.ए बी.एड/एम.एड
