Betul News:कानफाड़ू डीजे ने फिर ली जान! आस्था के नाम पर शोर कितना जायज?

कानफाड़ू डीजे ने फिर ली जान! आस्था के नाम पर शोर कितना जायज?

बैतूल। गणेश उत्सव के दौरान तेज आवाज में बजने वाले डीजे को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो रहे हैं। एक छात्रा की कार्डियक अरेस्ट से मौत की घटना ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर धार्मिक आयोजनों में ध्वनि की मर्यादा और स्वास्थ्य संबंधी संवेदनशीलता को लेकर जिम्मेदारी कौन लेगा? दस दिनों तक भगवान गणेश की भक्ति,पूजा-अर्चना और धार्मिक आयोजन होते हैं, लेकिन विसर्जन के दौरान कई जगह तेज आवाज वाले डीजे और देर रात तक चलने वाले साउंड सिस्टम को लेकर शिकायतें सामने आती हैं। सवाल यह है कि क्या तेज आवाज ही आस्था की ताकत का प्रमाण बन गई है? डीजे का तेज शोर केवल कानों तक सीमित नहीं रहता। बीमार, बुजुर्ग, छोटे बच्चों और अस्पतालों के आसपास रहने वाले लोगों के लिए यह परेशानी का कारण बन सकता है। कोई मरीज आराम कर रहा हो या किसी परिवार में कोई अस्वस्थ हो, फिर भी यदि कानफाड़ू आवाज में डीजे चलता रहे तो धार्मिक आयोजन की संवेदनशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। प्रशासन के साथ गणेश मंडलों को भी समझना होगा कि उत्सव भक्ति का है, शोर की प्रतियोगिता का नहीं। यदि डीजे का उपयोग किया जा रहा है तो निर्धारित नियमों और अनुमत ध्वनि सीमा का पालन होना चाहिए। आस्था ऐसी हो जो दूसरों की परेशानी का कारण न बने।क्या भगवान को प्रसन्न करने के लिए आवाज इतनी तेज करना जरूरी है कि इंसानों के कान जवाब देने लगें, मरीजों की नींद उड़ जाए और आसपास रहने वाले लोग परेशान होते रहें? दस दिन भगवान गणेश की पूजा, आराधना और सेवा… और फिर विसर्जन के दिन ऐसा शोर, मानो भक्ति की परीक्षा डीजे के वॉल्यूम से हो रही हो। जितना तेज साउंड, उतनी बड़ी आस्था क्या अब धार्मिक आयोजनों का पैमाना यही रह गया है? आज के दौर में ऐसा लगता है मानो भगवान को शायद भक्ति की आवाज सुनाने के बजाय डीजे का वॉल्यूम बढ़ाकर खुश करने की कोशिश की जा रही है। कोई मरीज आराम कर रहा हो, कोई बुजुर्ग परेशान हो रहा हो, किसी बच्चे की नींद टूट रही हो या किसी परिवार को तेज आवाज से दिक्कत हो रही हो लेकिन डीजे तो बजेगा, क्योंकि शायद भगवान को भी तभी सुनाई देगा!डीजे बजाना जरूरी है तो बजाइए, लेकिन क्या उसका वॉल्यूम इतना बढ़ाना भी जरूरी है कि पूरा मोहल्ला उसकी सजा भुगते?प्रशासन की जिम्मेदारी अपनी जगह है, लेकिन आयोजक मंडलों को भी यह समझना होगा कि धार्मिक स्वतंत्रता के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी जुड़ी है। आस्था किसी दूसरे की परेशानी की कीमत पर नहीं होनी चाहिए।

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