Betul News:सामाजिक तत्वों को टोकना थाना प्रभारी को पड़ा भारी! सवाल पूछने वाली पुलिस से ही हिसाब मांगने पहुंचे लोग?
रात में युवकों से पूछताछ करना गुनाह है क्या? थाना घेराव करने वालों से भी पूछिए कानून-व्यवस्था चाहिए या अपनी मनमर्जी?
सामाजिक तत्वों को टोकना थाना प्रभारी को पड़ा भारी! सवाल पूछने वाली पुलिस से ही हिसाब मांगने पहुंचे लोग?
रात में युवकों से पूछताछ करना गुनाह है क्या? थाना घेराव करने वालों से भी पूछिए कानून-व्यवस्था चाहिए या अपनी मनमर्जी?

बैतूल। कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है, लेकिन जब पुलिस अपनी जिम्मेदारी निभाने के दौरान ही विरोध के घेरे में आ जाए, तो सवाल उठना लाजिमी है। आठनेर में रात के समय युवकों से पूछताछ को लेकर शुरू हुआ विवाद थाने के घेराव तक पहुंच गया। अब सवाल यह है कि आखिर पुलिस करे तो क्या करे? संदिग्ध परिस्थितियों में लोगों को एकत्र देख पूछताछ करे, तो विरोध झेले और अगर कोई अप्रिय घटना हो जाए, तो लापरवाही के आरोप सुने? जानकारी के अनुसार, आठनेर थाना क्षेत्र में रात के समय करीब 20 से 25 युवक एक स्थान पर समूह बनाकर खड़े थे। इसी दौरान थाना प्रभारी ने उनसे वहां खड़े होने का कारण पूछा और समझाइश दी। आरोप है कि इसके बाद कुछ लोगों ने थाना प्रभारी के व्यवहार पर आपत्ति जताते हुए विरोध शुरू कर दिया। मामला बढ़ा और कुछ लोग थाने का घेराव करने पहुंच गए।अब सवाल यह है कि रात के समय एक जगह जमा युवकों से पूछताछ करना आखिर गलत कैसे हो गया? क्या पुलिस को अपनी जिम्मेदारी निभाने से पहले इस बात की चिंता भी करनी होगी कि कहीं कोई उसकी कार्रवाई से नाराज होकर विरोध पर न उतर आए?स्थानीय स्तर पर थाना परिसर के पास स्थित मैदान और उसके आसपास देर रात तक आसामाजिकतत्व बैठे रहते हैं इतना ही नहीं कुछ युवक वहां शराब और सिगरेट का सेवन करते हैं तथा कथित तौर पर अभद्र भाषा का इस्तेमाल भी करते हैं।यदि सार्वजनिक स्थानों पर इस तरह की गतिविधियां हो रही हैं, तो उनकी जांच और नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। आखिर सार्वजनिक स्थान किसी एक व्यक्ति या समूह की निजी जागीर तो हैं नहीं। वहां से महिलाएं, बच्चे और दूसरे नागरिक भी गुजरते हैं। उनकी सुरक्षा और सहजता सुनिश्चित करना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है,लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल है यदि पुलिस रात में निगरानी करती है, लोगों से पूछताछ करती है और समझाइश देती है, तो क्या हर बार इसे विवाद का विषय बना देना उचित है?

पुलिस की कार्रवाई गलत हो तो शिकायत कीजिए, लेकिन केवल पूछताछ के आधार पर अधिकारी को दोषी मान लेना भी कहां तक सही है,लोकतंत्र में पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना हर नागरिक का अधिकार है। यदि थाना प्रभारी ने मर्यादा का उल्लंघन किया है, तो शिकायत होनी चाहिए और निष्पक्ष जांच के बाद कार्रवाई भी होगी। वर्दी किसी अधिकारी को मनमानी का अधिकार नहीं देती।लेकिन सवाल केवल पुलिस से ही क्यों? विरोध करने वालों से भी पूछा जाना चाहिए कि उनकी आपत्ति आखिर किस बात पर थी? क्या विरोध कथित दुर्व्यवहार के खिलाफ था या युवकों से पूछताछ किए जाने पर!।कानून सबके लिए बराबर है। पुलिस को भी अपनी सीमाओं में रहकर काम करना है और आम नागरिकों को भी कानून-व्यवस्था बनाए रखने में सहयोग करना है,सामाजिक और राजनीतिक संगठनों का काम जनता की आवाज उठाना और प्रशासन को जवाबदेह बनाना है। लेकिन हर बार पुलिस कार्रवाई को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना देना समस्या का समाधान नहीं है। यदि कार्रवाई गलत है, तो तथ्य सामने रखिए। यदि अधिकारी का व्यवहार अनुचित है, तो शिकायत कीजिए। मगर यदि पुलिस केवल रात में एकत्र युवकों से पूछताछ कर रही थी, तो उस कार्रवाई का विरोध करने से पहले पूरे घटनाक्रम को समझना भी जरूरी है।देर रात सार्वजनिक स्थानों पर बैठकर बातचीत करना अपने आप में अपराध नहीं है। लेकिन यदि वहां किसी प्रकार की गैरकानूनी गतिविधि हो रही है या दूसरे नागरिकों को परेशानी हो रही है, तो पुलिस नियमानुसार कार्रवाई कर सकती है। इसी तरह पुलिस को भी पूछताछ के दौरान संयम, शालीनता और कानून का पालन करना चाहिए।आठनेर का यह घटनाक्रम एक बड़ा सवाल छोड़ रहा है। पुलिस संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखे तो कुछ लोगों को आपत्ति, कार्रवाई न करे तो लापरवाही के आरोप! आखिर कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी निभाने वाले तंत्र से अपेक्षा क्या है?थाना प्रभारी से सवाल जरूर पूछिए, लेकिन उन सामाजिक तत्व जिसके लिए थाने का घेराव किया उनसे भी पूछिए कि रात में सार्वजनिक स्थानों पर जमा होने का कारण क्या है! नेताओं और विरोध करने वालों को भी सोचना चाहिए कि वे कानून-व्यवस्था मजबूत करने के पक्ष में खड़े हैं या फिर हर पुलिस कार्रवाई को विवाद बनाकर अपना प्रभाव दिखाना चाहते हैं। और हां, यदि किसी को देर रात बैठकर गपशप करने का इतना ही शौक है, तो सार्वजनिक स्थानों पर दूसरों की परेशानी का कारण बनने के बजाय अपने घर के आंगन में बैठकर भी यह शौक पूरा किया जा सकता है! क्योंकि कानून-व्यवस्था न मनमर्जी से चल सकती है और न ही दबाव की राजनीति से।
