Betul News:अवैध वसूली के आरोपों ने फिर उठाया वही सवाल सिस्टम सच दिखाएगा या साहब की हिफ़ाज़त?

अवैध वसूली के आरोपों में घिरे तहसीलदार बरखानिया पर जब उन्हीं के साथ गए कोटवारों ने उंगली उठाई, तो पूरा सिस्टम सक्रिय हुआ लेकिन सच सामने लाने नहीं, बचाव की ढाल बनने।

अवैध वसूली के आरोपों ने फिर उठाया वही सवाल सिस्टम सच दिखाएगा या साहब की हिफ़ाज़त?

अवैध वसूली के आरोपों में घिरे तहसीलदार बरखानिया पर जब उन्हीं के साथ गए कोटवारों ने उंगली उठाई, तो पूरा सिस्टम सक्रिय हुआ लेकिन सच सामने लाने नहीं, बचाव की ढाल बनने।

जिले भर में भीमपुर में चल रहे अवैध कारनामों की चर्चा है। तहसीलदार की गाड़ी से रातामाटी गए तीन कोटवार और वाहन चालक द्वारा 80 हजार की अवैध वसूली और 20 हजार रुपए फोनपे पर लिए जाने का मामला सामने आने के बाद अब पूरी कहानी का नया ट्वीस्ट सामने आ गया है। जिस उमेश बामने के नंबर पर फोन पे किया गया था उन्होंने सामने आकर कहा है कि जो भी अवैध वसूली की गई उसके पीछे स्वयं तहसीलदार बरखानिया थे। कर्मचारियों को बस साथ में चलने के लिए मौखिक आदेश दिए गए थे। एक वीडियो के माध्यम से कोटवार उमेश बामने एवं तहसील कार्यालय में पदस्थ भृत्य ने पूरे घटनाक्रम को सिलसिलेवार उजागर किया। जानकारी के अनुसार अवैध वसूली का मामला उजागर होते ही तहसीलदार ने शुक्रवार को ही कलेक्टर नरेन्द्र कुमार सूर्यवंशी के सामने हाजरी लगा दी कि-साहब गाड़ी में मैं नहीं था। जब यह जानकारी कोटवारों को मिली तो उन्होंने भी खुलकर अपनी बात रखी। जानकारी के अनुसार कलेक्टर के दरबार में हाजरी लगाने के बाद तहसीलदार ने कोटवारों को नोटिस जारी कर दिए है। तहसीलदार साहब पर लगे आरोपों ने पूरे जिले में नई हलचल पैदा कर दी है। आरोप यह कि साहब ने खुद को बचाने के लिए दबाव की रणनीति अपनाई है। लेकिन जनता कहती हैं यह कोई नई कहानी नहीं जब भी किसी अफसर पर आरोप लगता है, पूरा सरकारी तंत्र अचानक जागता है लेकिन सच खोजने के लिए नहीं, साहब की ढाल बनने के लिए। यही दृश्य एक बार फिर दोहराया जा रहा है तहसीलदार पर लगे ताजा आरोपों में। जांच शुरू हो चुकी है, बयान दर्ज होंगे, रिपोर्ट बनेगी, फाइल आगे बढ़ेगी और अंत में परिणाम वही निकलने का डर है, जो जनता को वर्षों से दिखाया जाता रहा है: साहब बेदाग, कर्मचारी बलि का बकरा। जनता कहती है यह तंत्र की आदत है, जिम्मेदार नहीं बचते, बल्कि बचाए जाते हैं।फाइलों में गहराई कम, लीपापोती ज्यादा होती है। सवाल उठता है क्या इस बार भी ‘सिस्टम अपने ही आदमी की ढाल बनेगा या कलेक्टर साहब परंपरा तोड़कर सच्चाई को सामने लाने का साहस दिखाएंगे? लोकप्रिय कहावतें अब सरकारी तंत्र पर सटीक बैठती हैं मगरमच्छ मुस्कराते हैं, छोटी मछलियाँ तली जाती हैं।और जनता का तंज भी कड़वा है ऊँट के मुँह में जीरा जैसी कार्रवाई से अब भरोसा नहीं बनता।कलेक्टर से उम्मीद सिर्फ एक है इस बार न्याय सिर्फ आदेशों में नहीं, असर में दिखना चाहिए।वरना सिस्टम फिर वही करेगा जो वह सबसे अच्छा करता है तहसीलदार साहब को क्लीन चिट छोटे कर्मचारियों को निराशा।

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