Betul News:नेताओं के लिए प्राइवेट अस्पताल, जनता के लिए सरकारी लाचारगी?
नेताओं के लिए प्राइवेट अस्पताल, जनता के लिए सरकारी लाचारगी?

बैतूल।देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था का सबसे अहम आधार जनता होती है, लेकिन जब स्वास्थ्य सेवाओं की बात आती है तो यही जनता सबसे पीछे खड़ी नज़र आती है। शुक्रवार को भाजपा प्रदेश अध्यक्ष की अचानक तबीयत बिगड़ने पर उन्हें बिना देर किए निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। जबकि निजी अस्पताल से पहले सरकारी हॉस्पिटल था लेकिन नेता जी को निजी अस्पताल लेकर गए तो युवा विशाल भालेकर ने अपने फेसबुक हैंडल पर भाजपा सरकार की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठाए अपने हैडल पर लिखा कि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष की तबीयत बिगड़ी तो प्राइवेट अस्पताल में ईलाज कराया, देश और प्रदेश की जनता सरकारी अस्पताल की दहलीज पर दम तोड़ रही हैं ?

अपनी ही सरकार द्वारा जनता के लिए सरकारी सुविधा गिनवाई जाती है तो फिर अपने ही सरकार की स्वास्थ्य सेवाएं लेने में आखिर भाजपा नेता क्यों! सरकारी अस्पताल की सुविधा लेकर देखे तो पता चला गरीब व्यक्ति किस तरह से परेशान होता है! हालांकि प्रदेश अध्यक्ष तबीयत बिगड़ने ही उन्हें तुरंत प्राइवेट हॉस्पिटल में जाकर इलाज करवाया गया। उनकी हालत अब स्थिर बताई जा रही है।लेकिन यही तस्वीर अगर किसी आम आदमी के साथ घटे, तो कहानी बिल्कुल उलट होती है। सरकारी अस्पतालों की दहलीज़ पर उसे पहले लंबी कतारें झेलनी पड़ती हैं, फिर डॉक्टरों और दवाओं की कमी से जूझना पड़ता है। कई बार तो बिस्तर तक उपलब्ध नहीं होते और एम्बुलेंस में ऑक्सीजन की कमी के कारण लोग रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं।यहाँ सवाल सिर्फ़ स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि बराबरी के हक़ का है। लोकतंत्र में जहाँ जनता और नेता एक ही व्यवस्था का हिस्सा हैं, वहाँ स्वास्थ्य सेवाओं में यह असमानता क्यों? क्या आम नागरिक का जीवन नेताओं से कम मूल्यवान है?जब नेता बीमार होते हैं तो व्यवस्था तुरंत सक्रिय हो जाती है, लेकिन जब गरीब परिवार इलाज के अभाव में अपनों को खो देता है, तब वही व्यवस्था चुप्पी साध लेती है। यह खामोशी ही असल समस्या है। वही आप आदमी पार्टी के नेता विशाल भालेकर ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर इस दोहरी व्यवस्था पर सवाल पूछे। नेताओं को निजी अस्पताल का सहारा लेने का हक़ है, लेकिन जनता को भी उतनी ही गुणवत्तापूर्ण सुविधाएँ सरकारी अस्पतालों में क्यों न मिलें? आखिर यह व्यवस्था जनता के टैक्स के पैसों से ही तो चल रही है बड़ा सवाल यही है क्या भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था सिर्फ़ नेताओं के लिए वीआईपी और जनता के लिए लाचारगी का दूसरा नाम बनकर रह जाएगी?
