Betul News:NEET पर खामोशी, कलेक्टरेट में आक्रामकता? छात्र राजनीति के बदलते स्वरूप पर उठे बड़े सवाल

NEET पर खामोशी, कलेक्टरेट में आक्रामकता? छात्र राजनीति के बदलते स्वरूप पर उठे बड़े सवाल!

बैतूल। छात्र हितों की लड़ाई का दावा करने वाले संगठनों की भूमिका एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। एक ओर देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET में पेपर लीक और अनियमितताओं के आरोपों ने लाखों छात्रों के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए, वहीं दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर छात्र संगठनों के आंदोलनों की शैली और व्यवहार को लेकर भी बहस छिड़ गई है। NEET विवाद के दौरान देशभर में छात्र, अभिभावक और विशेषज्ञ परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता पर सवाल उठा रहे थे। मामला अदालतों तक पहुंचा, लेकिन कई छात्रों का आरोप है कि छात्र हितों की सबसे बड़ी आवाज बनने का दावा करने वाले संगठन इस मुद्दे पर उतने मुखर नहीं दिखे, जितने वे अन्य स्थानीय मुद्दों पर दिखाई देते हैं। कॉलेजों में नए कोर्स, छात्र सुविधाओं, फीस वृद्धि और अन्य विषयों को लेकर अक्सर ज्ञापन, प्रदर्शन और आंदोलन करने वाले छात्र संगठनों से कई विद्यार्थियों को उम्मीद थी कि वे NEET जैसे राष्ट्रीय स्तर के मुद्दे पर भी व्यापक आंदोलन करेंगे। छात्रों का सवाल है कि जब लाखों मेहनती युवाओं का भविष्य दांव पर था, तब उनकी आवाज को राष्ट्रीय स्तर पर बुलंद करने की जिम्मेदारी कौन निभा रहा था? शुक्रवार को कलेक्टर परिसर में छात्र राजनीति का एक बेहद हिंसक,उद्दंड और वीभत्स चेहरा देखने मिला । घटना की रिपोर्टिंग के दौरान हमने देखा कि छात्र संगठन के युवाओं ने पुलिस कर्मियों, अधिकारियों को धक्के देकर कलेक्टर कार्यालय में प्रवेश किया इस दौरान एक पुलिसकर्मी बुरी तरह गिर पड़े । कलेक्टर ,राजस्व अधिकारियों को खुली धमकियां और तेज़ अभद्र भाषा मे बात । फिर कलेक्टर कार्यालय में घुसने का प्रयास भी एक बेहद अनुचित कृत्य । अपने से बड़ो को, प्रोफेसर्स को,प्रिंसिपल तक को अनुशासन का पाठ पढ़ाने वाले छात्र ऐसा करेंगे ये बड़ा आश्चर्यजनक था । छात्रों का तर्क ये था कि दूसरे भी ऐसा करते हैं । यदि दूसरे जैसे आप हो तो फिर आप अलग कैसे हो ?? इनमें से कितने लोग स्टूडेंट नहीं थे ये जांच का विषय हो सकता है लेकिन यदि सभी स्टूडेंट थे तो ये एक स्टूडेंट की भाषा और आंदोलन का स्वरूप तो बिल्कुल नहीं हो सकता मसलन कलेक्टर ऐसा क्या काम कर रहे जो आ नहीं सकते.अगर 5 मिनट में नहीं आए तो हम अंदर घुस जाएंगे,वगैरह वगैरह। यदि उक्त संगठन को पोषित करने वाली सरकार नहीं होती तो शायद अब तक पुलिस प्रशासन इतनी उजड़ता बर्दाश्त नहीं करता और यदि कल इनकी जगह कोई और संगठन इस तरह की हिमाकत करता होता तो अब तक 10 -12 पर एफआईआर और कुटाई अलग हो गई होती । लोकतंत्र है साहब लोकतंत्र यहां नियम ,कानून ,कार्यवाही समय और चेहरे देखकर की जाती है।

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