Betul News:सुविधा की चाशनी में लिपटी गुलामी! नाम बदल गया, मिजाज नहीं !

सुविधा की चाशनी में लिपटी गुलामी! नाम बदल गया, मिजाज नहीं !

बैतूल।गुलामी बेहद बुरी है, भले ही इसका नाम कितना भी खूबसूरत क्यों न हो यह पंक्ति आज के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिदृश्य में गहरी चेतावनी की तरह सामने आती है। इतिहास गवाह है कि जब भी इंसान ने अपनी स्वतंत्रता खोई, उसकी पहचान, आत्मसम्मान और विचार की स्वतंत्रता सबसे पहले प्रभावित हुई।आज भले ही बेड़ियां दिखाई नहीं देतीं, लेकिन कई बार बंधन पहले से ज्यादा सूक्ष्म और जटिल रूप में मौजूद हैं। ऐसे में बदलते दौर में आज़ादी की असली कीमत को समझना पहले से अधिक जरूरी हो गया है  आज फर्क सिर्फ इतना है कि बेड़ियां अब इंसानों को जकड़ कर नहीं रखती लेकिन अब नेताओं की भाषणों में आती हैं साथ में ऑफर, स्कीम और मुस्कान भी। पहले जंजीरें खनकती थीं, अब नोटिफिकेशन बजता है और हमें लगता है कि हम ‘अपडेटेड’ हो गए हैं।अदृश्य नियंत्रण का नया मॉडल अब कोई हुक्म नहीं देता, बस विकल्प देता है। आपको लगता है कि आपने चुना है…असल में चुना वही गया है जो पहले से तय था। यह वही आज़ादी है जिसमें रास्ते चार दिखते हैं, पर मंज़िल एक ही होती है अनुकूलता। महंगाई पर चर्चा होती है, पर समाधान हमेशा धैर्य रखने की सलाह में बदल जाता है।कर्ज अब शर्म नहीं, स्टेटस है।नौकरी स्थायी नहीं, लेकिन उम्मीद रखिए विकास हो रहा है।आम आदमी दिन भर किस्तें भरता है, और रात में सोशल मीडिया पर आज़ादी के पोस्ट शेयर करता है। स्वतंत्रता अब EMI पर उपलब्ध है शर्तें लागू। लोकतंत्र में सवाल पूछना अधिकार है यह किताबों में लिखा है। लेकिन जमीनी हकीकत में सवाल पूछना अब जेल हो गया है या तो अपराधी बना दिये जाओगे या हालत ऐसे कर देंगे कि आप देश द्रोही हो इसकी डर में आज जो इंसान बोलना चाहता है उसके के खिलाफ धीरे-धीरे माहौल ऐसा बना दिया जाता है कि लोग खुद ही कहें चुप रहो, क्या मिलेगा बोलकर? वाह! बिना आदेश के अनुशासन… इसे ही तो आधुनिक प्रबंधन कहते हैं। इतना ही नहीं सुविधा का मीठा सौदा सुरक्षा चाहिए? सहमति दीजिए।विकास चाहिए? सवाल कम कीजिए। चुप्पी अपनाइए। ओर जब कोई कहे कि यह विकास मॉडल नहीं है, तो कुछ छूट भैया नेताओं का जवाब आएगा सब ठीक तो चल रहा है! उसे माना पड़ेगा कि सब ठीक चल रहा है बस सोच थोड़ी सीमित हो गई है।बस बोलने से पहले दस बार सोचना पड़ता है।बस निर्णय लेने से पहले हालात याद रखने पड़ते हैं।आज की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि बंधन अब दिखते नहीं।और जब बंधन दिखते नहीं, तो उन पर गर्व भी किया जा सकता है।सोने की जंजीर चमकती है इसलिए भारी नहीं लगती। पर सच यही है कि बंधन, चाहे सोने का हो या लोहे का… बंधन ही होता है। और अगर सच चुभे तो समझ लीजिए, कहीं न कहीं सच ने दस्तक दी है। लेकिन वो होगा नहीं गुलामी जो करनी है!

Rahul Raj $$

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