Education Department News:जर्जर हो चुकी स्कूल की हालत… टूटी छत व दीवारों के दरार में फंसा बच्चों का भविष्य
जर्जर हो चुकी स्कूल की हालत… टूटी छत व दीवारों के दरार में फंसा बच्चों का भविष्य

बैतूल जिले के बच्चे अपनी जिन्दगी को ताक में रखकर इस स्कूल में पढ़ाई करने आते हैं. जहां ना तो कोई सुविधा है ना किसी तरह से ये सुरक्षित ही है. बच्चे भेड़-बकरियों की तरह यहां पढ़ाई करने को मजबूर हैं वही शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले स्कूलों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। अनोखे न्यूज पोर्टल की पड़ताल में सामने आया है कि जिले के अधिकांश स्कूल एवं ग्रामीण अंचलों तक भवनों की हालत इतनी जर्जर हो चुकी है कि वहां पढ़ने वाले बच्चों की जान हर पल खतरे में है। कहीं छत का प्लास्टर गिर रहा है, तो कहीं दरवाजे टूटे हुए हैं। इन स्कूलों में कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है, लेकिन प्रशासन और जिम्मेदार अधिकारियों का इस ओर कोई ध्यान नहीं है।जर्जर भवनों का अनोखा सच न्यूज पोर्टल के पड़ताल के दौरान सामने आया कि बैतूल जिले के ग्रामीण और शहरी इलाकों में स्थित कई सरकारी स्कूलों की इमारतें दशकों पुरानी हैं और इनकी मरम्मत के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। कई स्कूलों में छत से प्लास्टर के टुकड़े गिरते देखे गए हैं, जो बच्चों के लिए सीधा खतरा बन रहे हैं। इसके अलावा, टूटे हुए दरवाजे, खिड़कियां और कमजोर दीवारें इन भवनों की स्थिति को और भी दयनीय बना रही हैं। कुछ स्कूलों में तो बरसात के दिनों में छत से पानी टपकता है, जिसके कारण बच्चों को पढ़ाई में परेशानी होती है और शिक्षकों को भी कक्षाएं संचालित करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है ह पूर्व में जिले के भीमपुर ब्लॉक के रतनपुर गांव में एक स्कूल की छत अचानक भर भरा कर गिर पड़ी थी।

वो तो शिक्षक की सूझबूझ से बच्चों की जान बच गई, लेकिन 6 छात्र घायल हो गए थे। उसके बाद भी प्रशासन ने कोई भी जर्जर भवनों की जांच तक नहीं कराई ऐसे लगता है कि फिर कोई हादसे का इंतजार है वही जर्जर स्कूल भवनों की गंभीर स्थिति का एक जीता-जागता उदाहरण है। जानकारों का कहना है कि अगर समय रहते इन भवनों की मरम्मत या पुनर्निर्माण नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में बड़ा हादसा होना तय है। अभिभावकों में भी इस बात को लेकर डर का माहौल है, और वे अपने बच्चों को स्कूल भेजने से पहले दो बार सोचते हैं। जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग इस समस्या से अनजान बने हुए हैं। सूत्रों के अनुसार, कई स्कूलों ने जर्जर भवनों की मरम्मत के लिए आवेदन दिए थे,

लेकिन बजट के अभाव बता कर कोई कार्रवाई नहीं हुई। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी खराब है, जहां स्कूलों के पास न तो पर्याप्त संसाधन हैं और न ही रखरखाव के लिए फंड।ग्रामीण और पालकों के पिछले कई सालों से सैकड़ों शिकायत कर दी है उसके बाद भी अब तक ना तो नया भवन बना और ना ही जर्जर भवन की मरम्मत की गई है. शासन प्रशासन की अनदेखी के चलते शिक्षा का मंदिर नहीं बन पाया है. हालात के अनदेखी और गैर जिम्मेदाराना रवैए के चलते एक स्थानीय शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “हम हर दिन डर के साए में पढ़ाते हैं।
