Betul News:कीबोर्ड का शेर और कानून की खामोशी सोशल मीडिया के स्वघोषित पर प्रशासन की चुप्पी क्यों?
कीबोर्ड का शेर और कानून की खामोशी सोशल मीडिया के स्वघोषित पर प्रशासन की चुप्पी क्यों?

बैतूल। सोशल मीडिया ऐसा एक प्लेटफार्म है जहां अभिव्यक्ति का माध्यम माना जाता है, वहीं अब यह कई लोगों के लिए आरोप प्रत्यारोप और छवि धूमिल करने का हथियार बनता जा रहा है। जिले में इन दिनों एक नाम लगातार चर्चा में है सचिन मालवीय, वह सोशल मीडिया के जरिए लोगों, जनप्रतिनिधियों और अब प्रशासनिक अधिकारियों तक की छवि पर सवाल खड़े करने वाले पोस्ट कर रहा है।बताया जा रहा है कि पहले आम लोगों और स्थानीय स्तर के विवादों तक सीमित रहने वाला यह कथित युवक अब प्रशासनिक अधिकारियों तक पहुंच गया है। हाल ही में एक वरिष्ठ अधिकारी को लेकर सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणी जिसमें उन्हें डरपोक जैसे शब्दों से संबोधित किया गया ने प्रशासनिक हलकों में भी हलचल पैदा कर दी है। हालांकि जिस अधिकारी के लिए सोशल मीडिया पर टिप्पणी की गई है वह नाम हम यहां नहीं लिख सकते क्योंकि पत्रकारिता की भी एक मर्यादा होती है इसलिए सोशल मीडिया पर की गई पस्ट का स्क्रीनशॉट लगा तो रहे हैं लेकिन अधिकारी का नाम ब्लर कर रहे है। वही एक सवाल है कि क्या बिना किसी ठोस साक्ष्य के किसी अधिकारी की छवि इस तरह सार्वजनिक मंच पर धूमिल करना उचित है? देखने में आ रहा है कि सचिन मालवीय द्वारा सोशल मीडिया पर लगातार ऐसे पोस्ट सामने आ रहे हैं जिनमें लोगों और अधिकारियों पर सीधे आरोप लगाए जा रहे हैं। कई बार इन पोस्टों में तथ्यात्मक आधार स्पष्ट नहीं होता, लेकिन शब्दों का चयन ऐसा होता है कि संबंधित व्यक्ति की छवि पर सवाल खड़े हो जाएं। पुलिस विभाग में पदस्थ उच्च अधिकारी से जब इस बात की चर्चा करी तो उनका भी मानना है कि सोशल मीडिया पर बिना प्रमाण किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना कानूनन गंभीर मामला हो सकता है। भारतीय दंड संहिता की धारा 499 और 500 के तहत मानहानि का प्रावधान है, जबकि आईटी कानून के तहत भी कई परिस्थितियों में कार्रवाई संभव है।अगर कोई पूछ ले कि सबूत क्या है, तो जवाब मिलता है सोशल मीडिया पर सबको पता है। अब यह सबको पता है वाली थ्योरी कानून की किताबों में तो नहीं लिखी, लेकिन फेसबुक यूनिवर्सिटी में शायद यही सबसे बड़ा प्रमाण है।इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चा जिस बात की हो रही है, वह है पुलिस विभाग की खामोशी।जब कोई आम व्यक्ति छोटी-सी आपत्तिजनक टिप्पणी कर दे तो तुरंत कानून की धाराओं में मामला दर्ज हो जजाता है। लेकिन जब सोशल मीडिया पर खुलेआम लोगों और अधिकारियों को निशाना बनाते पोस्ट सामने आते हैं, तब लगता है कि कानून थोड़ी देर के लिए चाय पीने चला गया है।
