News:वादों के शोर में दबती सच्चाई, सवालों से डरता सत्ता तंत्र और खामोशी की कीमत चुकाता आम नागरिक!
वादों के शोर में दबती सच्चाई, सवालों से डरता सत्ता तंत्र और खामोशी की कीमत चुकाता आम नागरिक!

देश आज सवालों के बोझ में दबता जा रहा है, और सच बोलने वाला हर इंसान धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है। लोकतंत्र की पहचान माने जाने वाले सवाल अब अवांछित हो चले हैं। वादों के शोर में समाज को कुचल दिया गया है और व्यवस्था चुपचाप बिकती जा रही है बिना शोर, बिना विरोध, बिना शर्म। किसान आज भी मिट्टी में उम्मीदें बो रहा है, लेकिन फसल से पहले ही नीतियों की ओलावृष्टि उसे तोड़ देती है। मजदूर शहरों में रोज़गार की तलाश में अपना वजूद खो रहा है। मेहनत की कीमत अब ज़मीन पर नहीं, केवल भाषणों और मंचों तक सिमट गई है। ग़रीब हर दिन थोड़ा और रो रहा है, पर उसकी आवाज़ आंकड़ों में दबा दी जाती है। नौजवान हाथों में डिग्रियां लिए खड़ा है, लेकिन उसका भविष्य फाइलों में बंद पड़ा है। सवाल पूछना अब प्रतिभा नहीं, जोखिम बन चुका है। जो सवाल करे, उसे रास्ते से हटा दिया जाता है कभी जांच के नाम पर, कभी बदनामी के नाम पर। क्योंकि आज सच बोलना सुविधा नहीं, गुनाह बनता जा रहा है। धर्म के नाम पर इंसान को बांटा जा रहा है, नफ़रत को पहचान बना दिया गया है। देश आज दुश्मनों से नहीं टूट रहा देश अपनों से ही टूटता जा रहा है। और सबसे खतरनाक बात यह है कि इस टूटन पर भी एक गहरी चुप्पी छाई हुई है।शायद इसलिए सब ठीक है। क्योंकि जब लोकतंत्र बोलना बंद कर दे, तब सत्ता को जवाब देने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।
