Betul News:सड़क हादसे से उठा विवाद कैसे बन गया सांप्रदायिक मुद्दा?
सड़क हादसे से उठा विवाद कैसे बन गया सांप्रदायिक मुद्दा?

मुलताई में इन दिनों यही चर्चा है। जो एक मामूली वाहन टक्कर का मामला जब जातीय और धार्मिक रंग लेने लगा, तो लोगों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक था! जो मामला एक साधारण सड़क हादसे से शुरू हुआ, वह देखते ही देखते धर्म और पहचान की बहस में बदल गया। सवाल उठ रहा है यह सब आकस्मिक था या किसी सुनियोजित कहानी का हिस्सा? सूत्रों के मुताबिक़ बाइक की हल्की टक्कर को लेकर दोनों पक्षों में पहले भी कहासुनी हो चुकी थी, जिसे सामान्य बातचीत से सुलझाया जा सकता था।लेकिन इस बार मामला अलग मोड़ ले गया। बताया जा रहा है कि आरएसएस से जुड़े शिशुपाल यादव ने बात करते समय दूसरे पक्ष के युवक को थप्पड़ मार दिया, जिससे स्थिति अचानक बिगड़ गई। स्थानीय लोगों का कहना है बात सुलझाने की बजाय नेता ने टकराव चुना, और यहीं से विवाद ने सांप्रदायिक रूप लेना शुरू किया।प्रचारक का एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें कहा गया कि मुस्लिम युवक ने टक्कर मारी ने जैसे आग में घी का काम किया। सोशल मीडिया पर इस घटना को संगठित रूप से सांप्रदायिक हमला बताने की कोशिश हुई, जबकि प्रारंभिक पुलिस रिपोर्टें साफ़ कहती हैं यह केवल सड़क विवाद से उपजा झगड़ा था। सवाल यह है जब बातचीत से मामला सुलझ सकता था, तो धार्मिक हवा क्यों दी गई?
क्या यह संयोग था कि ठीक इसी समय बैतूल में कफ सिरप से मासूम बच्चों की मौतें चर्चा में थीं?कहीं ऐसा तो नहीं कि जनता का ध्यान उस गंभीर मुद्दे से हटाने के लिए मुलताई की आग सुलगाई गई?

हालांकि पुलिस ने राजनीतिक दबाव के चलते अब तक 30 से अधिक लोगों पर प्रकरण दर्ज किए हैं। 3 मुख्य आरोपी जेल भेजे जा चुके हैं, और बाकी की तलाश जारी है। शहर में अतिरिक्त बल तैनात है, सोशल मीडिया की निगरानी की जा रही है। प्रशासन का दावा है कि स्थिति नियंत्रण में है, परंतु सवाल यह भी है क्या जांच निष्पक्ष हुई? ऐसा नहीं लगता कि करवाई दोनों पक्षों पर बराबर होनी थी विशेष समुदाय के लोगों ने अगर विवाद किया तो जेल वही हिन्दू नेता ने विवाद किया तो छूट ये देश के युवा पीढ़ी किस ओर जा रही है। सब को पता है कि विवाद किसने पहले किया लेकिन क्या करे हिन्दू वादी सरकार है इस लिए सांप्रदायिक तो होगा! यह स्पष्ट होगा कि पहली मार किसने की थी, या सच्चाई राजनीतिक दबाव में दबी रह जाएगी!मुलताई की यह घटना केवल दो समुदायों का झगड़ा नहीं, बल्कि प्रणाली की परीक्षा है।जनता अब यह समझने लगी है कि हर विवाद का रंग धर्म नहीं होता कभी-कभी यह ध्यान भटकाने की राजनीति भी हो सकती है।हमने अपने पाठकों से वादा किया है कि सच्चाई चाहे असुविधाजनक क्यों न हो, दिखाई जाएगी।जब झूठी धार्मिक उत्तेजनाएँ असली मुद्दों को ढकने लगें तब पत्रकारिता का काम है धुआँ नहीं, आग का कारण दिखाना।क्योंकि समाज को झूठी शांति नहीं, सच्चे उत्तर चाहिए।
