Politics News:जनता जाए भाड़ में, सत्ता चाहिए हर हाल में! हरदा में बयान नहीं, लोकतंत्र पर हमला हरदा।

जनता जाए भाड़ में, सत्ता चाहिए हर हाल में! हरदा में बयान नहीं, लोकतंत्र पर हमला
हरदा।

चाहे रुपए का ढेर लगाना पड़े या किसी को मारना पड़े… चाहे दिल्ली में बम कांड करना पड़े.. हमें तो किसी भी हालत में हमारी सरकार बनाना है


सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जहां हरदा में करणी सेना परिवार के आंदोलन को नेहरू स्टेडियम में हिन्दू महासभा के विद्यार्थी परिषद प्रदेश अध्यक्ष विश्वकर्मा गुरुजी ने शेरपुर को जीवन भाई संबोधित करते हुए घोर आपत्तिजनक भाषण में कहा कि वीर जवानों उठो अब वह समय आ गया है कि हमें हमारे हक की लड़ाई लड़ना है। हमें तो किसी हालत में हमारी सरकार बनानी है… चाहे रुपए को ढेर लगाना पड़े या किसी को मारना पड़े.. चाहे दिल्ली में बम कांड करना पड़े… हमें सरकार बनाना है… हमें कोई मतलब नहीं है किसी से… हमें जीतना ही है… किसी भी हालत में भाड़ में जाए जनता के मुद्दे… भाड़ में जाए वो माताएं बहनें… भाड़ में जाए वो युवा… भाड़ में जाए पढ़े लिखे राजनीति जब सेवा से उतरकर सत्ता की सनक बन जाए, तब भाषा भी बेलगाम हो जाती है। हरदा में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम में दिया गया कथित भड़काऊ बयान अब सिर्फ़ विवाद नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा पर सीधा प्रहार माना जा रहा है।
कार्यक्रम के दौरान मंच से जो कहा गया, उसने राजनीति की मर्यादा ही नहीं, संवेदनशीलता और कानून तीनों को कटघरे में खड़ा कर दिया।
“भाड़ में जाए माताएं-बहनें और जनता के मुद्दे…
हमें तो किसी भी हालत में सरकार बनानी है।
चाहे रुपयों का ढेर लगाना पड़े, चाहे किसी को मारना पड़े! यह शब्द अब सवाल बनकर खड़े हैं क्या सत्ता पाने की भूख इतनी अंधी हो चुकी है कि इंसानियत भी बोझ लगने लगे? वही करनी सेना अपनी 21 सूत्रीय मांगों की आड़ में ‘जनक्रांति न्याय यात्रा’ के नाम पर हरदा में शक्ति प्रदर्शन का दावा करने वाले कथित जीवनसिंह की पोल एक ही दिन में खुल गई। नेहरू स्टेडियम में लाखों की भीड़ का दावा महज 15 हजार पर सिमट गया। आमरण अनशन और आंदोलन की बड़ी-बड़ी घोषणाए सिर्फ 10 घंटे में दम तोड़ गई। प्रशासन की सख्ती और स्पष्ट चेतावनी के बीच जीवनसिंह का हौसला भी ढह लाठीचार्ज की मजिस्ट्रियल जांच के आदेश के बाद आंदोलन अचानक समाप्त कर दिया गया. यानि करणी सेना परिवार सरगना की ठाकुरी टोपी हवा में उड़ गई… यहीं से सामने आया आंदोलन का असली चेहरा और गुप्त एजेंडा।

21 मांगों का शोर, दरअसल राजनीति में एंट्री का शोर था। गुनाहों पर आत के बाद अब सियासत की चिलमन नजर आई… सर्व समाज के नाम पर जुटाई गई भीड़ महज सियासी लॉन्चिंग पैड साबित हुई। बाकी 20 मांगें एक झटके में हवा ही गई। मुनाहों के इतिहास पर राजनीतिक के बदल डालने की कोशिश उजागर हो गई। आंदोलन नहीं, यह चुनावी स्क्रिप्ट थी।

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