Betul News:न सिफारिश का सहारा, न पैरवी का जोर! नए कप्तान के राज में अब थानों की मनमानी पर लगेगा क्या विराम या सिर्फ बतौलेबाजी?
न सिफारिश का सहारा, न पैरवी का जोर! नए कप्तान के राज में अब थानों की मनमानी पर लगेगा क्या विराम या सिर्फ बतोलेबाजी?
नए पुलिस कप्तान की एंट्री से थानों में हलचल की उम्मीद, वर्षों पुराने ढर्रे पर चलेगी सुधार की झाड़ू या फिर बयानबाजी तक सीमित रहेगा बदलाव? नाबालिगों के अपराध और थाना प्रभारियों की कार्यशैली होगी असली परीक्षा।

बैतूल पुलिस महकमे में नए कप्तान की आमद के साथ ही उम्मीदों का बाजार गर्म हो गया है। अब चर्चा इस बात की नहीं कि किसकी किससे पहचान है, किसकी किसके दरबार में पहुंच है और किसकी सिफारिश कितनी वजनदार है। चर्चा इस बात की है कि आखिर थानों में काम कब दिखाई देगा?क्योंकि जनता को अब बतोलेबाजी नहीं कार्रवाई का परिणाम चाहिए।क्या काराजनीतिक समीकरणों में बने रहने वाले थानेदारों की भी बढ़ी धड़कनें,मन पसंद थानों में जमे आरक्षकों की रवानगी भी तय होगी क्या ? वैसे जब से जिले में नए कप्तान साहब ने पदभार संभाला है तब से अपराध नियंत्रण से ज्यादा महकमे में कप्तान के मिजाज की चल रही है बतौलबाजी! संदेश अगर वाकई जमीन पर उतरा तो कई लोगों की परेशानी बढ़ सकती है। खासकर उन लोगों की, जिनके लिए थाने में काम से ज्यादा पहचान काम आती है। अब तक कहीं पैरवी का फोन, कहीं सिफारिश का दबाव और कहीं लंबी-चौड़ी बतौलेबाजी से काम चल जाता था। लेकिन अब सवाल है कि क्या इन पुराने हथकंडों की दुकान बंद होगी या फिर दुकान का बोर्ड बदलकर कारोबार पहले जैसा ही चलेगा? जिले के थानों में कार्रवाई के दावे तो अक्सर सुनाई देते हैं। प्रेस नोट भी आते हैं, गिरफ्तारियों की जानकारी भी मिलती है और अपराध नियंत्रण के दावे भी होते हैं। मगर असली सवाल यह है कि आम आदमी की शिकायत पर कितनी तत्परता दिखाई जाती है? पीड़ित को थाने के चक्कर लगाने पड़ते हैं या उसकी समस्या का समाधान भी होता है? क्योंकि पुलिसिंग सिर्फ अपराध दर्ज करने और प्रेस नोट जारी करने का नाम नहीं है। अपराध रोकना, पीड़ित की सुनवाई करना और दोषियों पर निष्पक्ष कार्रवाई करना भी पुलिस की जिम्मेदारी है।शहर और जिले में नाबालिगों की आपराधिक गतिविधियों को लेकर उठ रही चिंताएं भी नए कप्तान के लिए बड़ी परीक्षा हैं। आखिर बच्चे अपराध की दुनिया की ओर क्यों बढ़ रहे हैं? उन्हें कौन इस्तेमाल कर रहा है? उनके पीछे कौन से चेहरे हैं? और समय रहते उन्हें रोकने के लिए पुलिस की रणनीति क्या है? सिर्फ नाबालिगों को पकड़कर कार्रवाई कर देना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। उन्हें अपराध में धकेलने वाले तत्वों तक पहुंचना भी जरूरी है। वरना छोटे चेहरे सामने आते रहेंगे और पर्दे के पीछे बैठे किरदार बेफिक्र रहेंगे।जिन थाना क्षेत्रों में लगातार शिकायतें सामने आती हैं, वहां जिम्मेदारी तय होना जरूरी है। आखिर वरिष्ठ अधिकारियों तक थानों की वास्तविक स्थिति पहुंचती कैसे है? क्या केवल सरकारी आंकड़ों से जिले की कानून व्यवस्था का मूल्यांकन हो सकता है या फिर कभी आम जनता के बीच जाकर भी हकीकत देखी जाएगी? थाना प्रभारी की कार्यशैली का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उन्होंने कितनी बैठकें कीं और कितने प्रेस नोट जारी किए। असली रिपोर्ट कार्ड यह होना चाहिए कि अपराध कितने नियंत्रित हुए, पीड़ितों को कितनी राहत मिली और शिकायतों पर कितनी निष्पक्ष कार्रवाई हुई। हाल ही में पत्रकारों के साथ चाय पर चर्चा में नाबालिगों के अपराध का मुद्दा भी उठा था। इसी बीच नए कप्तान की एक बात चर्चा में है न पैरवी चलेगी, न सिफारिश और न बतौलेबाजी, सिर्फ काम से काम। बात सुनने में तो अच्छी है, लेकिन बैतूल की पुलिस व्यवस्था में इसका असर कितना दिखाई देगा, यह आने वाला समय बताएगा। क्योंकि बयान देना आसान है, लेकिन वर्षों से जमे ढर्रे को बदलना आसान नहीं। अब देखना यह है कि बिना सिफारिश के आम आदमी की शिकायत सुनी जाती है या नहीं, राजनीतिक दबाव से परे कार्रवाई होती है या नहीं और लापरवाही करने वाले जिम्मेदारों से जवाब मांगा जाता है या नहीं। बैतूल को ऐसे पुलिस कप्तान की जरूरत है जो थानों की चमकती रिपोर्ट से ज्यादा जमीन की धूल देखे। जिसे अधिकारियों की वाहवाही से ज्यादा पीड़ित की आवाज सुनाई दे। जहां अपराधी को कानून का डर हो और फरियादी को थाने जाने में डर न लगे।क्योंकि जनता को पुलिस की बतौलेबाजी नहीं, भरोसे की गारंटी चाहिए।अब कप्तान साहब, गेंद आपके पाले में है। पैरवी और सिफारिश का खेल बंद होता है या फिर पुराने खिलाड़ी नए नियमों में भी अपना खेल जारी रखते हैं इसका फैसला आपके काम से होगा, आपके बयानों से नहीं!
