Betul News:केंद्रीय मंत्री का पद इतना छोटा कि सरेआम अपशब्दों पर भी खामोशी? बैतूल में वायरल वीडियो ने भाजपा की चुप्पी पर उठाए सवाल
सबका साथ, सबका विकास’ का नारा देने वाली भाजपा के नेताओं से सवालअपने ही सांसद और केंद्रीय मंत्री के कथित अपमान पर आखिर मौन क्यों?
केंद्रीय मंत्री का पद इतना छोटा कि सरेआम अपशब्दों पर भी खामोशी? बैतूल में वायरल वीडियो ने भाजपा की चुप्पी पर उठाए सवाल
सबका साथ, सबका विकास’ का नारा देने वाली भाजपा के नेताओं से सवालअपने ही सांसद और केंद्रीय मंत्री के कथित अपमान पर आखिर मौन क्यों?

बैतूल। राजनीति में नारे बड़े-बड़े लगाए जाते हैं, मंचों से सम्मान और सामाजिक समरसता की बातें भी खूब होती हैं, लेकिन जब अपने ही खेमे से जुड़े किसी व्यक्ति पर सवाल उठते हैं, तो अचानक खामोशी क्यों छा जाती है? बैतूल में सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो ने भाजपा की राजनीतिक कार्यशैली और नेताओं की चुप्पी पर सवाल खड़े कर दिए हैं।वायरल वीडियो को लेकर दावा किया जा रहा है कि राष्ट्रीय हिंदू सेना के प्रदेश अध्यक्ष दीपक मालवीय केंद्रीय राज्य मंत्री एवं बैतूल सांसद दुर्गादास (डीडी) उइके के लिए कथित तौर पर अपशब्दों का इस्तेमाल करते दिखाई दे रहे हैं। वीडियो में एक अन्य व्यक्ति द्वारा डीडी उइके को फुटेज में शामिल नहीं करने की बात कहे जाने का भी दावा है। हालांकि, वीडियो की प्रामाणिकता और पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है।विरोधियों की बारी आए तो आवाज बुलंद होती है,अपनों की बात आए तो खामोशी पसंद होती है।सिद्धांतों की बातें करने वालों, इतना तो बताओ,क्या इंसाफ की भी सियासत में अलग-अलग कीमत होती है?विधायक एवं प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल सहित स्थानीय भाजपा नेताओं की चुप्पी पर सवाल उठ रहे हैं। क्या पार्टी नेतृत्व इस मामले को गंभीरता से लेगा? क्या संबंधित व्यक्ति से जवाब मांगा जाएगा? या फिर यह मामला भी कुछ दिनों की सोशल मीडिया चर्चा के बाद ठंडे बस्ते में चला जाएगा?राजनीतिक गलियारों में यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि ऐसे ही आरोप कांग्रेस के किसी नेता पर लगे होते, तो क्या भाजपा का विरोध इतना शांत रहता? क्या बयानबाजी और प्रदर्शन शुरू नहीं हो जाते?गैरों की गलती पर महफिल में शोर मचाते हैं,अपनों की बारी आए तो नजरें चुराते हैं।सियासत के ये कैसे उसूल बना रखे हैं,सवाल दूसरों से, जवाब खुद से क्यों छिपाते हैं?राजनीति में एक कहावत है दांत भी अपने और जीभ भी अपनी, तो काटें किसको?’ बैतूल के इस घटनाक्रम में यह कहावत चर्चा का विषय बन गई है।सवाल यह है कि क्या राजनीतिक अनुशासन केवल विरोधियों के लिए है, या अपने खेमे के लोगों से भी जवाब मांगा जाएगा? यदि वीडियो में लगाए जा रहे आरोप सही साबित होते हैं, तो पार्टी नेतृत्व को अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए। डीडी उइके आदिवासी समाज से आते हैं और केंद्र सरकार में मंत्री हैं। ऐसे में उनके कथित अपमान को लेकर आदिवासी सम्मान का सवाल भी उठ रहा है तो वही क्या आदिवासी समाज से आने की वजह से उनको टारगेट किया गया खैर जो भी हो लेकिन किसी भी जनप्रतिनिधि के प्रति अभद्र भाषा के इस्तेमाल की पुष्टि होने पर जवाबदेही तय होनी चाहिए। सम्मान की बात केवल मंचों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। क्या केंद्रीय मंत्री का पद इतना छोटा और कमजोर हो गया है कि कोई भी व्यक्ति उनके खिलाफ खुलेआम अपशब्दों का इस्तेमाल कर सकता है? या फिर इस पूरे मामले में आदिवासी समाज से आने वाले जनप्रतिनिधि के सम्मान का सवाल भी जुड़ा है? बैतूल में पिछले दो दिनों से सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो ने ऐसे कई सवाल खड़े कर दिए हैं।वायरल वीडियो को लेकर दावा किया जा रहा है कि इसमें राष्ट्रीय हिंदू सेना के नेता दीपक मालवीय ने केंद्रीय राज्य मंत्री एवं बैतूल सांसद दुर्गादास (डीडी) उइके के लिए कथित तौर पर अपशब्दों का इस्तेमाल करते दिखाई दे रहे हैं। वीडियो में एक अन्य व्यक्ति की आवाज भी सुनाई देने की बात कही जा रही है, जिसमें कथित तौर पर डीडी उइके को फुटेज में शामिल नहीं करने की बात कही जाती है। वही आम जनता के मन में सवाल उठ रहे हैं कि अपने ही केंद्रीय मंत्री के कथित अपमान पर भाजपा की चुप्पी क्यों! बैतूल विधायक हेमंत खंडेलवाल, जो प्रदेश में भाजपा की कमान भी संभाल रहे हैं, सहित अन्य प्रमुख भाजपा नेताओं की ओर से इस मामले में स्पष्ट प्रतिक्रिया क्यों नहीं आई ये समझ से परे है! क्या पार्टी नेतृत्व इस वीडियो को गंभीरता से लेगा? क्या संबंधित व्यक्ति से जवाब मांगा जाएगा? या मामला कुछ दिनों की सोशल मीडिया चर्चा के बाद ठंडे बस्ते में चला जाएगा? ये सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि मामला किसी सामान्य राजनीतिक कार्यकर्ता का नहीं, बल्कि देश की सरकार में केंद्रीय मंत्री और बैतूल के सांसद के सम्मान से जुड़ा है।
कांग्रेस के नेता होते तो तब भाजपा की प्रतिक्रिया अलग होती?
राजनीति में विरोधियों के खिलाफ बयानबाजी और विरोध प्रदर्शन अक्सर देखने को मिलते हैं। यदि इसी तरह के आरोप कांग्रेस के किसी नेता पर लगे होते, तो क्या भाजपा की ओर से तत्काल विरोध दर्ज कराया जाता? क्या पुतला दहन और बयानबाजी शुरू हो जाती? यह सवाल भाजपा की राजनीतिक कार्यशैली और उसके नेताओं के दोहरे मापदंडों को लेकर उठ रहे है। राजनीति में एक कहावत प्रचलित है दांत भी अपने और जीभ भी अपनी, तो काटें किसको?’ बैतूल के मौजूदा घटनाक्रम में यह कहावत इसलिए चर्चा में है, क्योंकि वायरल वीडियो में लगाए जा रहे आरोपों के बीच भाजपा के स्थानीय नेतृत्व की चुप्पी पर सवाल खड़े हो रहे हैं।वही जब विपक्षी नेताओं ने घटना की निंदा करते हुए सवाल उठाए, तो कुछ मीडिया रिपोर्टों में घटना के मूल पहलुओं के बजाय विपक्ष की प्रतिक्रिया को प्रमुखता दी गई। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या किसी घटना की निंदा करना और उस पर जवाबदेही मांगना भी राजनीतिक चश्मे से देखा जाना चाहिए !पत्रकारिता का दायित्व घटना के सभी पहलुओं की निष्पक्ष पड़ताल करना, संबंधित पक्षों का पक्ष सामने लाना और तथ्यों के आधार पर जनता को जानकारी देना है। सवाल विपक्ष की प्रतिक्रिया पर भी हो सकते हैं, लेकिन घटना की गंभीरता और उससे जुड़े मूल सवालों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। आखिर पत्रकारिता की कसौटी किसी का पक्ष लेना नहीं, बल्कि तथ्यों के आधार पर सच को सामने लाना है।
आदिवासी समाज के सम्मान का सवाल भी महत्वपूर्ण
डीडी उइके आदिवासी समाज से आने वाले जनप्रतिनिधि हैं। ऐसे में इस घटनाक्रम को लेकर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या किसी आदिवासी जनप्रतिनिधि के कथित अपमान पर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया उतनी ही स्पष्ट और मुखर होगी, जितनी किसी अन्य प्रभावशाली नेता के मामले में होती है!
अब भाजपा नेतृत्व को स्पष्ट जवाब देना चाहिए
बैतूल की जनता के सामने अब कुछ सीधे सवाल हैं वायरल वीडियो की सच्चाई क्या है? संबंधित व्यक्ति का इस मामले में क्या पक्ष है? भाजपा नेतृत्व इस पर क्या कहता है? और क्या केंद्रीय मंत्री के कथित अपमान के मामले में पार्टी कोई स्पष्ट रुख अपनाएगी?लोकतंत्र में किसी भी नेता से सवाल पूछे जा सकते हैं, उसकी नीतियों की आलोचना की जा सकती है, लेकिन राजनीतिक मतभेदों के बीच मर्यादा और सम्मान भी जरूरी हैं।अब देखना यह है कि ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा देने वाला भाजपा नेतृत्व इस मामले में अपनी चुप्पी तोड़ता है या बैतूल के इस वायरल वीडियो पर उठ रहे सवालों का जवाब जनता को खुद ही तलाशना पड़ेगा।भाजपा लगातार ‘सबका साथ, सबका विकास’ और सामाजिक समरसता की बात करती है। जब अपने ही पार्टी के नेता को आप शब्द कहने पर पार्टी के भीतर इस मामले पर अब तक सार्वजनिक प्रतिक्रिया क्यों नहीं आई?
