Political News:असूल जो संगठन की माँ बहन कर रहा! क्या संगठन में मिलेगा बड़ा पद?
असूल जो संगठन की माँ बहन कर रहा! क्या संगठन में मिलेगा बड़ा पद?

बैतूल शहर में जब से सत्ता पक्ष के युवा मोर्चा की नियुक्ति होने वाली है तभी से तथाकथित अंशुल का नाम सामने आ रहा है इसके बाद से शहर में चर्चा चल रही है कि क्या संगठन ऐसे युवक को ऊंचा पद देगा जो हमेशा गाली गलोच अपशब्दों का उपयोग करता हो क्या संगठन की ये विचार धारा है। वैसे तो कुछ लोगों ने बिना नाम न छापने की शर्त पर बताया कि लोन से घर चलाने वाला नेता क्या संगठन विस्तार के लिए जिले में प्रवास पर जाएगा तो क्या लोन लेगा या भैया के भरोसे कोई वेतन भत्ता मिलेगा ये तो निजी विवेक है इस पर टिप्पणी करना उचित नहीं लेकिन पाठकों ने बताया है तो उनको नाराज भी नहीं किया जा सकता! वैसे इस हलकट की एक ऑडियो भी खूब वायरल हुआ था जिसमें या फोन पर बात करते वक्त गंदे शब्द बोले जो लिख नहीं सकते,वैसे असूल को चार लोग नहीं जानते लेकिन नेता ऐसे बनता है मानो विधायक हो गया। ऐसे हलकट हरकते करने वाले को क्या ऊँचे पद पर बैठना उचित है क्या संगठन में पद का आधार आचरण होना चाहिए या केवल महत्वाकांक्षा? जब भी किसी राजनीतिक संगठन में नई नियुक्तियों की चर्चा शुरू होती है, तब कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों के बीच यह सवाल भी उठने लगता है कि आखिर पद किसे और किन मानकों के आधार पर दिया जाना चाहिए। क्या केवल सक्रियता, प्रचार और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा किसी बड़े पद की पात्रता तय कर सकती है, या फिर व्यक्ति का व्यवहार, भाषा, अनुशासन और संगठन के प्रति उसकी प्रतिबद्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है? किसी भी संगठन की पहचान उसके झंडे, बैनर और नारों से नहीं बल्कि उसके पदाधिकारियों के आचरण से होती है। यदि किसी संगठन का प्रतिनिधित्व करने वाला व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में संयमित भाषा का उपयोग नहीं करता, विवादों में घिरा रहता है, दूसरों के प्रति सम्मानजनक व्यवहार नहीं रखता या अपने शब्दों पर नियंत्रण नहीं रख पाता, तो ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। संगठन केवल पद बांटने की व्यवस्था नहीं होता, वह विचार, संस्कार और अनुशासन की एक श्रृंखला होता है। इसलिए किसी भी पदाधिकारी से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने व्यवहार से संगठन की गरिमा को बढ़ाए, न कि उसे विवादों में डाले। राजनीतिक दलों में हजारों कार्यकर्ता वर्षों तक मेहनत करते हैं, गांव-गांव और वार्ड-वार्ड जाकर संगठन को मजबूत बनाते हैं, जनता के बीच संवाद स्थापित करते हैं और कठिन परिस्थितियों में भी पार्टी के साथ खड़े रहते हैं। ऐसे में यदि पद वितरण के समय केवल शोर मचाने वालों, स्वयं को बड़ा नेता बताने वालों या चर्चा में बने रहने वालों को प्राथमिकता मिलती है, तो समर्पित कार्यकर्ताओं के मन में निराशा पैदा होना स्वाभाविक है। किसी भी संगठन का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह योग्यता, अनुशासन और कार्यकर्ता सम्मान को कितना महत्व देता है। पद मिलने के बाद व्यक्ति केवल स्वयं का नहीं बल्कि पूरे संगठन का चेहरा बन जाता है। उसके शब्द, उसके निर्णय और उसका सार्वजनिक व्यवहार सीधे संगठन की छवि को प्रभावित करते हैं। इसलिए संगठन विस्तार और नेतृत्व चयन के समय यह देखना आवश्यक है कि संबंधित व्यक्ति समाज में कैसी छवि रखता है, लोगों के बीच उसका व्यवहार कैसा है और क्या वह संगठन के मूल्यों का पालन करता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सवाल उठाना गलत नहीं है। कार्यकर्ताओं और नागरिकों को यह अधिकार है कि वे संगठन से अपेक्षा करें कि जिम्मेदार पदों पर ऐसे लोगों को अवसर मिले जो मर्यादित, जिम्मेदार और सकारात्मक नेतृत्व का उदाहरण प्रस्तुत कर सकें। आखिरकार पद सम्मान नहीं, जिम्मेदारी होता है और जिम्मेदारी उसी व्यक्ति को मिलनी चाहिए जो उसे निभाने की क्षमता भी रखता हो। संगठन यदि अपने निर्णयों में पारदर्शिता, अनुशासन और कार्यकर्ता सम्मान को प्राथमिकता देगा तो उसकी विश्वसनीयता मजबूत होगी, वहीं यदि इन बातों की अनदेखी की जाएगी तो चर्चा, असंतोष और सवाल उठना भी स्वाभाविक रहेगा। जनता और कार्यकर्ताओं की नजर हमेशा इस बात पर रहती है कि संगठन अपने सिद्धांतों पर कितना खरा उतरता है और उसके पदाधिकारी उन सिद्धांतों का कितना पालन करते हैं। यही किसी भी राजनीतिक संगठन की वास्तविक परीक्षा होती है।
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