Betul News:अपराधी गतिविधियों में लिप्त भी बन रहे पत्रकार! इन के बारे मे पूरा हिसाब लिखता पर लिखूं कैसे मुझे लिखना नहीं आता !
अपराधी गतिविधियों में लिप्त भी बन रहे पत्रकार! इन के बारे मे पूरा हिसाब लिखता पर लिखूं कैसे मुझे लिखना नहीं आता !

बैतूल।वो तमाम सैलाब लिखता पल पल का हिसाब लिखता बादलों का वो कड़कना बिजली का मुझ पर गिरना दिन रात के सारे हिसाब लिखता पर लिखूं कैसे मुझे लिखना नहीं आता यह शायरी के माध्यमस मैं अपने पाठकों को बताना चाह रहा हूं। जिले में इन दिनों जिस व्यवसाय की सबसे अधिक चर्चा है उसमें मजदूरी, ठेकेदारी, व्यापार, दलाली, झोलाछाप चिकित्सा न होकर आश्चर्य जनक रूप से पत्रकारिता है। जी हाँ पत्रकारिता के व्यवसाय याने पत्रकार बनने के लिए न तो अधिक श्रम की आवश्यकता है,न पूंजी की और तो और ना हीं किसी विशेष शिक्षा का मानदंड या डिग्री की।बस करना इतना है कि थोड़े अलफाज हो,बकबकिया हो,थोड़ा सा आधा अधूरा समाचारों का ज्ञान चाहे लिखना-पढऩा ना भी आता हो तो आप के लिए यह व्यवसाय काफी फ़ायदे मंद साबित हो सकता है। एक बार कहीं से यह तमगा या ठप्पा लगा नहीं कि आप सौ-दो सौ और कभी हजारों के आसामी बन सकते है।वैसे इस पत्रकारिता की अवैध फसल को लहलहाने का मौका हमारे शासकीय हुक्मरान और कर्मचारी बरबस ही मुहैया कराते हैं। देखा जा रहा है इन दिनों जिसे कुछ करना नहीं सूझता और ऊपर बताई गई योग्यताऐ रखते हो तो वह पत्रकार बन जाता है पत्रकार बनने की फेहरिस्त में अखबार बांटने और बंडल बनाने वालों से लेकर कुख्यात जुआरी और सटोरिऐ व ब्याज में पैसे चलाने वाले से लेकर कुछ होटलों के बैरे और खानसामा भी है। इन्हे पत्रकार बनाने या बन जाने देने में हमारे स्थानीय समाचार पत्रों के संपादकों का भी कम योगदान नहीं है।ठीक उसी तर्ज पर जैसे बड़े नेता अपने लग्गा भग्गुओं को खैरात बांटता है। खरपतवार गाजर घास की तरह उग आए पत्रकारों का झुरमुट,खास तौर पर जनपद जिला पंचायत सोसायटियों के दफ्तर,तहसील और पंचायतों में पनपता देखा जा सकता है।जिले में अगर पत्रकारों की बात करें तो बहुत ही कम लोग होगे जो सही तरीके से देश के चौथे स्तंभ पत्रकारिता कर रहे होगे और अपनी कलम से जनता के बीच प्रशासन की कमी बता रहे हैं। तो वही कुछ ऐसे भी पत्रकार बन चुके हैं जो पहले कई अपराधी गतिविधियों में लिप्त है अब तो पत्रकारिता का तमका आप को पांच हजार से लेकर जैसे आपकी हैसियत के हिसाब से मिल जाएगा। और उसको लाने के बाद पूरे शहर में तमका लगा कर निकल जाएंगे अपने अवैध कामों को अंजाम देने के लिए गलती इसमें उन की नहीं हे जो। कामों में लिप्त है गलती तो उनकी है जो जानते हुए भी इन जैसे को पत्रकार बना रहे हैं क्या अब समाज के अंदर पत्रकारों को अगर सही मायने में कहा जाए तो एक प्रकार से एजेंट बोल सकते हैं क्योंकि वास्तविकता पत्रकारिता करने वाला व्यक्ति तो सदा समाज में एक निष्पक्ष और लेखक पत्रकार समाज में अपनी साफ छवि रखने वाला ही रहेगा लेकिन उनको कलंकित करने के लिए जो पत्रकार बनकर घूम रहा है उनको रोकना अति आवश्यक है वैसे तो शहर में एक चर्चा बहुत की जो पहली मुखबिरी करता था आज ओ भी पत्रकार बनकर शहर में घूमता है और सभी विभागों में उठता बैठता है। इतना ही नहीं उसके बारे में कहा जाता है कि जिस के भी साथ रहेगा पहले उसको बर्बाद करता है वैसे दबी जुबान से लोगों को यह भी कहना है कि खुद को तो लिखते नहीं आता लेकिन उसके साथ एक ऐसा व्यक्ति है जो जगह-जगह अपने शब्दों को बेचता है या यू का कहा जाए की भरे बाजार एक बिकाऊ और निहाती गिरा हुआ वह व्यक्ति है वैसे यह व्यक्ति हमेशा नए कंधे की तलाश में रहता है जब तक इस निहायती गिरे व्यक्ति को उस कंधे से काम निकलता है जब तक उसे व्यक्ति का कंधा काम करने के लायक रहता है अन्यथा फिर एक नया व्यक्ति ढूंढ कर उसके कंधे का उपयोग करने लग जाता है वैसे इन व्यक्तियों की अलग ही एक गैंग है जो आए दिन लोगों के खिलाफ शरियत और झूठी अफवाह उड़ाने में कुख्यात हैं! वैसे अभी जिस कंधे का वह उपयोग कर रहा है उसके बारे में कहा गया है कि कुछ सालों पहले किसी थाना प्रभारी का पैसा इसके द्वारा गबन कर लिया गया था लेकिन वह थाना प्रभारी इतना प्रबल और चतुर्थ की उसने पैसे गबन किए व्यक्ति को बंधक बनाकर रख लिया था हालांकि इस बात पर कितनी सच्चाई है यह तो पैसे गबन करने वाला जाने और वह थाना प्रभारी जाने जिसने बंधक किया था वैसे बैतूल में यह कहावत सही है कि यहां के लोगों पर विश्वास करना एक अंधे के हाथ में लकड़ी देने जैसा है। क्योंकि बढ़ बोले और खुद के मुंह से मिट्ठू मियां बनने वाले लोगों की तादाद बैतूल में बहुत ज्यादा है।इन स्वनामधारी पत्रकारों के बारे में क्या जिलाधिकारी, अनुविभागीय अधिकारी (एस .डी.एम)या फिर जनसंपर्क कार्यालय को जानकारी नहीं है ?ऐसा हो नहीं सकता तो फिर ये जिम्मेदार आखिर खामोश क्यों है? क्या कहीं इनकी भी तो नब्ज नहीं दबी है? जो भी हो पर इस उदासीनता से गैर पेशागत और ब्लैकमेलर इन द्वारा सों जो अपने आपको पत्रकार बताते हैं और अपने वाहनों पर कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक की तर्ज पर प्रेस का मोनो चस्पा करते हैं से स्थापित और वास्तविक पत्रकारों को यदा-कदा अपमान का सामना करना पड़ता है और काफी हद तक पत्रकारिता व्यवसाय की थू-थू- हो रही है से इंकार नहीं किया जा सकता।
