Betul News:एक ही राज्य, दो मॉडल: बैतूल को पीपीपी तो श्योपुर–सिंगरौली को मिला सरकारी कॉलेज
एक ही राज्य, दो मॉडल: बैतूल को पीपीपी तो श्योपुर–सिंगरौली को मिला सरकारी कॉलेज!

बैतूल।मध्यप्रदेश में मेडिकल कॉलेजों के विस्तार को लेकर सरकार ने दो अलग-अलग रास्ते चुने हैं। श्योपुर और सिंगरौली जैसे आदिवासी बहुल ज़िलों में पूरी तरह सरकारी मेडिकल कॉलेज खोले जा रहे हैं, जबकि बैतूल में प्रस्तावित कॉलेज पब्लिक–प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल पर बनेगा। यही अंतर अब बैतूल में राजनीतिक और सामाजिक बहस का बड़ा मुद्दा बन गया है। सरकार का तर्क है कि श्योपुर और सिंगरौली पिछड़े आदिवासी जिले हैं, जबकि बैतूल में आर्थिक सामाजिक हैसियत बेहतर है, इसलिए बैतूल में पीपीपी मॉडल चुना गया।लेकिन जागरूक नागरिकों का कहना है कि बैतूल भी आदिवासी और वनांचल बहुल जिला है, ऐसे में ‘दोहरे पैमाने’ का फ़ैसला क्यों क्या जिले के जनप्रतिनिधियों को नहीं पता!
दो मॉडल, दो तस्वीरें
श्योपुर और सिंगरौली पूरी तरह सरकारी मेडिकल कॉलेज।
ज़मीन, भवन, स्टाफ और संचालन सबका खर्च राज्य सरकार उठाएगी।
बैतूल का (PPP मॉडल)
सरकार ज़मीन और आधारभूत सहयोग देगी।
निजी भागीदार कॉलेज निर्माण, उपकरण, फैकल्टी नियुक्ति और संचालन संभालेगा।
पीपीपी मॉडल का असर सरल भाषा में इसका मतलब है कि कॉलेज और अस्पताल का संचालन निजी हाथों में रहेगा।
सीटों का बड़ा हिस्सा मैनेजमेंट/एनआरआई कोटे में जा सकता है।
मुफ़्त चिकित्सा सेवाएँ सीमित दायरे में सिमट सकती हैं।
जवाबदेही सीधे जनता के बजाय निजी प्रबंधन पर रहेगी।
दोहरे पैमाने का तर्क
बैतूल भी आदिवासी–बहुल जिला है, फिर श्योपुर–सिंगरौली को सरकारी और बैतूल को पीपीपी क्यों? सरकारी कॉलेजों में एमबीबीएस फ़ीस नियंत्रित रहती है, जबकि पीपीपी मॉडल में फ़ीस बढ़ना तय माना जा रहा है।क्या आर्थिक रूप से कमज़ोर छात्रों और बैतूल के युवाओं के लिए सुरक्षित सीटें तय होंगी?
क्या आयुष्मान योजना और अन्य सरकारी योजनाएँ सहजता से लागू होंगी या फिर पैकेज आधारित शुल्क बाधा बनेगा? फ़ीस, भर्ती और सेवा गुणवत्ता की निगरानी सरकार करेगी या निजी प्रबंधन? ट्यूशन और हॉस्टल फ़ीस अधिक हो सकती है। छात्रवृत्ति और जिला कोटे की माँग तेज़ होगी।सीमित मुफ़्त सेवाएँ उपलब्ध होंगी। ग़रीब मरीजों को इलाज के लिए काग़ज़ी औपचारिकताओं और रेफ़रल झंझटों से गुज़रना पड़ सकता है।आधुनिक उपकरण और विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध होंगे, लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं की वहनीयता सबसे बड़ा सवाल बनी रहेगी नियुक्तियाँ तेज़ी से होंगी, लेकिन अनुबंध निजी होंगे और पे-स्केल व ट्रांसफ़र पॉलिसी अनिश्चित रह सकती है।कुल मिलाकर, बैतूल में मेडिकल कॉलेज का निर्माण तो तेज़ी से होगा, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह जिला ‘आमजन की पहुँच वाला सरकारी कॉलेज हो पाएगा या फिर ‘निजी दबाव वाला महँगा मेडिकल हब बनकर रह जाएगा?
