Crime News:शहर में नाबालिगों को कौन धकेल रहा नशे और जुर्म की दलदल में?
हर जुर्म पर पुलिस दोषी, हर मौत पर सिस्टम मौन नाबालिगों को अपराध की ढाल बनाकर कब तक बचेगा समाज?
शहर में नाबालिगों को कौन धकेल रहा नशे और जुर्म की दलदल में?
हर जुर्म पर पुलिस दोषी, हर मौत पर सिस्टम मौन नाबालिगों को अपराध की ढाल बनाकर कब तक बचेगा समाज?

बैतूल।ज़िले में बढ़ते अपराधों को लेकर इन दिनों लगभग हर अख़बार की सुर्ख़ी एक जैसी है पुलिस से भी नहीं संभल रहा ज़िला, क्राइम आउट ऑफ कंट्रोल”। यह सच है कि अपराध बढ़े हैं, हालात चिंताजनक हैं, लेकिन इस शोर में एक बुनियादी सवाल लगातार दबाया जा रहा हैआख़िर नाबालिगों के छोटे हाथों से इतने बड़े जुर्म हो कैसे रहे हैं?सूत्रों के अनुसार शहर में सक्रिय आपराधिक गैंग अब नाबालिगों को खुलकर ‘सेफ शील्ड’ की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। कानून की नरमी और सिस्टम की ढिलाई का फायदा उठाकर बच्चों से संगीन अपराध करवाए जा रहे हैं, ताकि असली मास्टरमाइंड हर बार कानून के शिकंजे से बाहर निकल जाएं। यह कोई तात्कालिक या अचानक पैदा हुई स्थिति नहीं, बल्कि जिले में लंबे समय से चल रही एक सोची-समझी रणनीति है,लेकिन सवाल सिर्फ़ गैंग या अपराधियों तक सीमित नहीं है। जितनी जवाबदेही नाबालिग अपराधियों की है, उतनी ही जिम्मेदारी उनके माता-पिता की भी बनती है। आज कई परिवारों में हालात यह हैं कि अभिभावक यह जानने तक की ज़हमत नहीं उठाते कि उनका बच्चा कहां जा रहा है, किसके साथ उठ-बैठ रहा है, उसकी दोस्ती किन लोगों से जुड़ चुकी है। यही लापरवाही, यही बेफिक्री धीरे-धीरे बच्चों को अपराध की दलदल में धकेल देती है।हर बार शासन-प्रशासन और पुलिस को कटघरे में खड़ा कर देना सबसे आसान रास्ता है। लेकिन क्या हर अपराध को रोकने की जिम्मेदारी सिर्फ़ पुलिस की है? पुलिस भी इंसान है। अपराध करने वाला भी इंसान है उसे भी डर लगता है। फर्क बस इतना है कि आज हालात ऐसे बन चुके हैं कि अपराधी बेख़ौफ़ हो गया है और जनता अपराधी को देखकर डरने लगी है।हाल ही में ज़िले में हुई एक दर्दनाक घटना इस सच्चाई को बेनकाब करती है। यह वारदात किसी सुनसान सड़क या जंगल में नहीं, बल्कि घनी आबादी वाले मोहल्ले के बीच अंजाम दी गई। जिस वार्ड की आबादी करीब 4 से 5 हज़ार बताई जाती है, वहां लोग मौजूद थे, सबने देखा लेकिन किसी ने रोकने की कोशिश नहीं की। अगर उस भीड़ में से एक भी इंसान आगे बढ़ता, जिसकी इंसानियत अब भी ज़िंदा होती, तो शायद एक नाबालिग की जान बच सकती थी।यह मानना होगा कि हर बार पुलिस को दोष देना न सिर्फ़ आसान है, बल्कि एक तरह से अपनी जिम्मेदारी से भागना भी है। अपराध सिर्फ़ पुलिस की नाकामी नहीं, बल्कि समाज, परिवार और सिस्टम तीनों की सामूहिक विफलता है। जब तक माता-पिता जागरूक नहीं होंगे, समाज अपराध को देखकर चुप नहीं रहेगा और आम नागरिक डर छोड़कर हिम्मत नहीं दिखाएगा, तब तक नाबालिगों को ‘सेफ शील्ड’ बनाकर अपराध करवाने का खेल यूं ही चलता रहेगा।शहर में नाबालिगों को कौन धकेल रहा नशे और जुर्म की दलदल में?
कल पड़े अनोखा सच में पिता सिस्टम में, माँ शिक्षा में फिर अपराधी कैसे बना बच्चा?
