Betul News:इलाज का वादा या मुनाफ़े का मॉडल? बैतूल में पीपीटी मेडिकल कॉलेज और गरीबों की सेहत का सवाल!

इलाज का वादा या मुनाफ़े का मॉडल? बैतूल में पीपीटी मेडिकल कॉलेज और गरीबों की सेहत का सवाल!

बैतूल जैसे आदिवासी-ग्रामीण ज़िले में मेडिकल कॉलेज की घोषणा अपने-आप में बड़ी सौगात है। वर्षों से इलाज के लिए नागपुर, भोपाल और इंदौर की ओर भागती जनता के लिए यह उम्मीद की किरण भी है। लेकिन जब यह मेडिकल कॉलेज पीपीटी (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) मॉडल पर बन रहा हो, तो सवाल पूछना ज़रूरी हो जाता है कि जो मेडिकल कॉलेज जिले में सरकारी खुलना था वह पीपीटी मोड पर खुल रहा है, क्या यह कॉलेज वास्तव में गरीबों के इलाज का सहारा बनेगा, या फिर सेहत के नाम पर एक और कारोबारी ढांचा खड़ा किया जा रहा है?पीपीटी मॉडल का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है। बोर्ड पर सरकारी मेडिकल कॉलेज लिखा होता है, लेकिन भीतर का तंत्र निजी अस्पताल की तरह चलता है।इलाज, जांच, भर्ती सब कुछ लाभ के गणित से तय होता है। गरीब मरीज के लिए यह फर्क समझना मुश्किल हो जाता है कि वह सरकारी व्यवस्था में है या निजी में। क्यों कि जिला अभी तो सरकारी जिला अस्पताल में गरीबों के साथ संवेदना नहीं रखी जाती है हर छोटे से इलाज के लिए पैसे मांगे जाते हैं, कई बार जिला अस्पताल से पैसे लेते हुए वीडियो वायरल हुआ है लेकिन क्या हुआ सिर्फ गरीब मरीज के परिजनों को जांच के नाम पर आश्वासन हर छोटी सी बीमारी पर भोपाल रैफर का खेल चलता है अगर पीपीटी मोड पर मेडिकल कॉलेज खुलेगा और जिला अस्पताल मर्ज है तो क्या गरीब मरीज के साथ जो अभी हो रहा है बंद हो जाएगा या इसे ज्यादा ओर गंभीर स्थिति बनेगी खेर जिले में मेंडिकल कॉलेज खुल रहा है और सरकार दावा भी कर रही है कि आयुष्मान योजना लागू होगी, गरीबों को लाभ मिलेगा। लेकिन देशभर के पीपीटी अस्पतालों का अनुभव बताता है,आयुष्मान सीमित बीमारियों तक,बाहर से दवाइयाँ,बाहर से जांच,यह पैकेज में नहीं आता” जैसे जुमले नतीजा मरीज सरकारी योजना लेकर आया, लेकिन घर लौटा कर्ज़ का बोझ लेकर। मेडिकल कॉलेज केवल इलाज का केंद्र नहीं, बल्कि शिक्षा का संस्थान भी होता है।पीपीटी मॉडल में, भारीभरकम फीस,मैनेजमेंट कोटा,ग्रामीण और आदिवासी छात्रों के लिए सीमित अवसर क्या यह कॉलेज बैतूल के बच्चों के लिए बनेगा, या बाहर से पैसे वाले छात्रों के लिए? जब अस्पताल का संचालन निजी हाथों में हो, तो डॉक्टर पर भी दबाव होता है ज़्यादा जांच,ज़्यादा भर्ती ज़्यादा रेफरल यह चिकित्सा नहीं, मैनेजमेंट मॉडल बन जाता है।और इस मॉडल में सबसे पहले नुकसान होता है,गरीब मरीज का। वही अगर बात करे फायदे की तो वह भी, अधूरे से लग रहे हैं क्यों कि बैतूल जिला आदिवासी बाहुल्य समाज से बना हुआ है या सबसे ज्यादा आदिवासी समाज और गरीब परिवार के लोग मिलेगे अगर निष्पक्षता से देखें तो मेडिकल कॉलेज से कुछ स्पेशलिस्ट सेवाएँ आएँगी जिला अस्पताल का दबाव घटेगा शहर का इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ेगा लेकिन इन सब में एक जनता का असली सवाल नियंत्रण किसका?अगर सरकार,बेड की संख्या,इलाज की दर,योजनाओं का पालन,फीस और सीटों का नियंत्रण अपने हाथ में नहीं रखती,तो पीपीटी मेडिकल कॉलेज सेवा नहीं, सौदा बनकर रह जाएगा। मेडिकल कॉलेज की इमारत से उम्मीद नहीं जगी रहती,उम्मीद जगी रहती है उसके नियमों से।अगर नियम मुनाफ़े के हुए,तो गरीब के लिए इलाज फिर भी दूर रहेगा।बैतूल को मेडिकल कॉलेज चाहिए लेकिन उससे ज़्यादा ज़रूरी है यह तय करना कि क्या यह कॉलेज जनता के लिए होगा या केवल उद्घाटन की तस्वीरों के लिए।इनके लिए जनहित, शहर का हित का कोई मतलब नहीं है। बैतूल जिले में देखा जा सकता है कि यहां असली मुद्दे भुला कर नीचे की समस्या समाधान ही सबसे बड़ा मसला है। बैतूल की मीडिया में खराब परंपराएं तब आई, जब कुछ लोग का अपने स्वार्थ और हित के लिए पत्रकार बन गए। यह वे लोग है जिन्होंने अपने फायदें के लिए मीडिया को कई संगठन में बंटवा दिया है और आज मीडिया में भीड़ तो बहुत बढ़ गई है पर असली सवाल के साथ रिपोर्टर लापता हो गए हैं

संपादकीय राहुल नागले बैतूल

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