Betul News:कप्तान बदले… पुलिसिंग का मिजाज भी बदल गया! बैतूल में क्यों होने लगी पुराने दौर की चर्चा?
किसी ने रातों में जागकर भरोसा जीता… किसी ने संवाद से सिस्टम को जिंदा रखा… और अब सवालों के घेरे में खामोश पुलिसिंग
कप्तान बदले… पुलिसिंग का मिजाज भी बदल गया! बैतूल में क्यों होने लगी पुराने दौर की चर्चा?
किसी ने रातों में जागकर भरोसा जीता… किसी ने संवाद से सिस्टम को जिंदा रखा… और अब सवालों के घेरे में खामोश पुलिसिंग

बैतूल जिले में इन दिनों पुलिस प्रशासन को लेकर जितनी चर्चा अपराधों की नहीं हो रही, उससे कहीं ज्यादा चर्चा पुलिस की कार्यशैली को लेकर हो रही है। चौक-चौराहों से लेकर चाय की दुकानों तक, पत्रकारों की बैठकों से लेकर सोशल मीडिया तक हर जगह एक ही सवाल सुनाई दे रहा है,आखिर बैतूल पुलिस की सक्रियता अब पहले जैसी दिखाई क्यों नहीं देती?जिले के वर्तमान पुलिस अधीक्षक वीरेंद्र जैन को पद संभाले करीब 8 महीने से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन इस दौरान पुलिस प्रशासन का वह चेहरा आम लोगों के सामने नहीं आ पाया जिसकी लोगों को उम्मीद थी। ना अपराधों को लेकर खुला संवाद और ना ही ऐसी सार्वजनिक सक्रियता, जो जनता के बीच भरोसे का माहौल बना सके। वही अगर बात करे तो पत्रकारों से फोन पर बात तो दूर सवालों से भी बचते नजर आ रहे हैं तभी तो किसी भी घटना में प्रेस कॉन्फेंस करने की बजाए एक वीडियो जारी कर देते हैं ताकि सवालों से बचा जाए इतना ही नहीं शहर में कानून व्यवस्था केवल थानों और फाइलों से नहीं चलती, उसका सबसे मजबूत आधार जनता का भरोसा होता है। और भरोसा तब बनता है जब सिस्टम दिखाई देता है, सुनाई देता है और जवाब भी देता है। लेकिन बैतूल में इन दिनों सबसे ज्यादा जिस चीज की कमी महसूस की जा रही है, वह है संवाद।हालांकि हर अधिकारी की अपनी अलग कार्यशैली होती है। कोई शांत रहकर काम करना पसंद करता है, तो कोई मैदान में उतरकर। लेकिन बैतूल के लोग आज भी उन पुलिस कप्तानों को याद करते नजर आते हैं, जिन्होंने सिर्फ कुर्सी नहीं संभाली, बल्कि जिले की नब्ज को समझने की कोशिश भी की।पूर्व एसपी सिद्धार्थ चौधरी का कार्यकाल भले छोटा रहा हो, लेकिन उनकी कार्यप्रणाली आज भी चर्चाओं में बनी हुई है। लोगों को याद है कि जिले में कहीं भी कोई बड़ी घटना होती थी, तो पुलिस की सक्रियता तुरंत दिखाई देती थी। रात हो या दिन, फोन उठाना और जानकारी लेना उनकी आदत मानी जाती थी। यही वजह थी कि लोगों को लगता था कि जिले का कप्तान “फील्ड में मौजूद है।उनकी कार्यशैली में सख्ती भी थी और जवाबदेही भी। कई पुलिसकर्मी भी मानते थे कि सिस्टम तभी मजबूत दिखता है जब नेतृत्व मैदान में नजर आए। शायद यही कारण रहा कि उनका छोटा कार्यकाल भी लोगों के बीच अपनी अलग पहचान छोड़ गया।वहीं पूर्व एसपी निश्चल झरिया का नाम आते ही लोगों के चेहरे पर अलग तरह की प्रतिक्रिया दिखाई देती है। उन्हें सिर्फ एक अधिकारी नहीं, बल्कि “सुनने वाला कप्तान” माना जाता था। पत्रकारों के फोन उठाना, छोटी-बड़ी घटनाओं की जानकारी रखना और पुलिस व मीडिया के बीच संवाद बनाए रखना उनकी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती थी। आप जनता से लेकर कई पत्रकार बताते हैं कि आधी रात में भी यदि कोई गंभीर घटना होती थी, तो फोन रिसीव होना लगभग तय माना जाता था। यही वजह थी कि पुलिस और मीडिया के बीच भरोसे का रिश्ता बना रहता था। लोगों को लगता था कि जिले का कप्तान सिर्फ कुर्सी पर बैठकर नहीं, बल्कि हर गतिविधि पर नजर रखकर काम कर रहा है।लेकिन वर्तमान समय में हालात बदले हुए नजर आ रहे हैं। जिले में कई ऐसे मामले सामने आए, जिन्होंने पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए। कहीं आरोपी फरार होने की चर्चा हुई, कहीं कार्रवाई में देरी के आरोप लगे, तो कहीं पुलिस और जनता के बीच बढ़ती दूरी महसूस की गई।अब सवाल यही उठ रहा है कि क्या बदलते समय के साथ पुलिसिंग का तरीका भी बदल गया है, या फिर जनता की उम्मीदें पहले से ज्यादा बढ़ गई हैं? बैतूल में फिलहाल चर्चा सिर्फ अपराधों की नहीं, बल्कि उस मौजूदगी की हो रही है,जिसे लोग एक समय पुलिस की सबसे बड़ी ताकत मानते थे। वही वर्तमान कप्तान आप जानता से बात करते करते फोन काट देते हैं पीड़ित लोगों की पूरी बात सुने बगैर फोन काटना सही नहीं है साहब!
नोट अनोखा सच न्यूज में आम जनता की जो बात चौक चौराहों पर हो रही है खबर उस आधार पर लगाई है किसी को छोटा या बड़ा आंकने का हमारा नजरिया नहीं है लेकिन आम जनता की बातों को भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता।
