Betul News: 3% कम पड़ रहा इसलिए इंजीनियर खुद ही बन बैठा ठेकेदार!
3% कम पड़ रहा इसलिए इंजीनियर खुद ही बन बैठा ठेकेदार!

बैतूल में विकास कार्यों की नई परिभाषा लिखी जा रही है। यहां कुछ लोग सरकारी नौकरी को नौकरी नहीं, बल्कि मल्टीपरपज़ पैकेज समझ बैठे हैं। पद भी अपना, प्रभाव भी अपना और अब ठेकेदारी भी अपनी! चर्चा है कि ग्राम पंचायत पाढर में एक इंजीनियर साहब को ठेकेदारों से मिलने वाला कथित हिस्सा इतना कम लगा कि उन्होंने बीच का रास्ता ही खत्म कर दिया। जब सब कुछ खुद ही करना है तो फिर ठेकेदार की जरूरत क्या? न किसी को हिस्सा देना, न किसी से हिसाब लेना, सीधे मैदान में उतर जाओ।आम आदमी सोचता है कि इंजीनियर निर्माण कार्यों की गुणवत्ता जांचता होगा, लेकिन यहां तो सवाल यह उठ रहा है कि अगर इंजीनियर ही ठेकेदार बन जाए तो जांच किसकी होगी और करेगा कौन? कहीं ऐसा तो नहीं कि माप-पुस्तिका भी अपनी, बिल भी अपना और प्रमाणपत्र भी अपना? सरकारी नियम-कायदों की किताबें शायद इसी दिन के लिए लिखी गई थीं कि उन्हें अलमारी में बंद रखा जाए और मौके के हिसाब से उनकी व्याख्या की जाए। वरना एक शासकीय कर्मचारी को टेंडर मिलने का रास्ता आखिर खुला कैसे? क्या सिस्टम सो रहा था या फिर सब कुछ देखकर भी आंखें मूंदे बैठा था?सबसे दिलचस्प बात यह है कि सरकार पारदर्शिता की बात करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ लोग पारदर्शिता को ऐसा बना देते हैं कि आर-पार सब दिखाई देने लगता है—कौन लाभ ले रहा है, कौन मौन है और कौन संरक्षण दे रहा है। पाढर का यह मामला केवल एक पंचायत का नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है जहां कभी-कभी कुर्सी जिम्मेदारी कम और अवसर ज्यादा बन जाती है। सवाल यह नहीं कि इंजीनियर साहब ठेकेदार बने या नहीं, सवाल यह है कि यदि बने तो नियम कहां गए? और यदि नियम मौजूद हैं तो कार्रवाई कहां है?फिलहाल गांव में चर्चा गर्म है और जवाब ठंडे। अधिकारी मौन हैं, जिम्मेदार चुप हैं और जनता यह समझने की कोशिश कर रही है कि आखिर सरकारी कर्मचारी और ठेकेदार के बीच की रेखा कब मिट गई। वही ये कहना उचित है कि इंजीनियर साहब ने तो पाढर में विकास का एक नया मॉडल जरूर पेश कर दिया है खुद ही योजना बनाओ, खुद ही काम कराओ, खुद ही जांच करो और खुद ही भुगतान का रास्ता साफ करो!
वाह साहब… 3 प्रतिशत सचमुच बहुत कम होता है! अनोखा सच सवाल वही, जो जवाब मांगते हैं।
