Politics News:एक वीआईपी की मौत, चार गुमनाम जनाज़े क्या शोक भी पद देखकर होता है?
एक वीआईपी की मौत, चार गुमनाम जनाज़े क्या शोक भी पद देखकर होता है?

राजनीति में कब क्या हो जाए, कोई नहीं जानता। लेकिन एक कड़वा सच हर बार सामने आ खड़ा होता है हर बड़े हादसे के बाद भी पिसता वही है, जिसे सिस्टम पहले से ही हाशिये पर खड़ा कर चुका होता है। हालिया विमान/हेलिकॉप्टर हादसा इसका ताज़ा उदाहरण है। सत्ता के एक बड़े चेहरे की मौत पर पूरा देश ठिठक गया। टीवी स्टूडियो शोक में डूब गए, नेताओं की संवेदनाओं की कतार लग गई, बयान दर बयान जारी होने लगे। दुख होना चाहिए इस पर कोई विवाद नहीं। वही डिप्टी सीएम की पत्नी को पद भी दे दिया गया। मीडिया में उसका बखान खूब हो रहा है लेकिन एक सवाल उसी हादसे में मौजूद चार और लोग? उनके नाम, उनके चेहरे, उनके परिवार सब जैसे खबरों की भीड़ में दबा दिए गए। सवाल यह नहीं कि किसी एक की मौत बड़ी क्यों बनी सवाल यह है कि बाकियों की मौत छोटी कैसे मान ली गई? अगर उन चार लोगों में कोई मंत्री, सांसद या सत्ता के करीब कोई चेहरा होता, तो क्या तस्वीर अलग नहीं होती? यह केवल एक हादसा नहीं, बल्कि वीआईपी लोकतंत्र का खुला प्रदर्शन है जहाँ संविधान की समानता किताबों में सुरक्षित है और ज़मीन पर पहचान से तय होती है। आम आदमी की जान आज भी सबसे सस्ती है, क्योंकि उसके पीछे न वोट बैंक है, न सत्ता का दबाव, न कैमरे की चमक। हादसे में हुई जिनकी मौत पायलट सुमित कपूर, शांभवी पाठक, विदिप जाधव और पिंकी माली सवार थे.लोकतंत्र तब खोखला हो जाता है, जब मौत पर भी राजनीति हावी हो जाए। और जब तक हर नागरिक की जान की कीमत एक-सी नहीं मानी जाएगी, तब तक यह सवाल ज़िंदा रहेगा!क्या इस देश में इंसान पहले पद होता है, और बाद में नागरिक
