Betul News:संविधान हत्या दिवस _सरकारी कार्यालयों कलेक्ट्रेट में मनाया जाना कितना उचित? जब सरकार ही हत्या दिवस मनाने लगेगी तो कानून का क्या होगा,?
संविधान हत्या दिवस _सरकारी कार्यालयों कलेक्ट्रेट में मनाया जाना कितना उचित? जब सरकार ही हत्या दिवस मनाने लगेगी तो कानून का क्या होगा,?

मीसा बंदियों लोकतंत्र सैनानियों का आपातकाल की 50 वीं वर्षगांठ पर ताम्र पत्र देकर सम्मानित किया जाना उचित है और सर्वथा प्रशंसनीय कार्य है कि उनके त्याग समर्पण का सम्मान होना चाहिए लेकिन कार्यक्रम को संविधान हत्या दिवस के रूप मे मनाएं जाने को कदापि उचित नहीं कहा जा सकता हैं। एक राजनीतिक दल इस शीर्षक से कार्यक्रम करें उचित है किन्तु सरकार हत्या शब्द का उपयोग करते हुए कोई कार्यक्रम का आयोजन करें सर्वथा अनुचित असंवैधानिक है। सरकार संविधान आत्मा दिवस मना लेती, संविधान लोकतांत्रिक मूल्य दिवस मना लेती, सरकार संविधान व्याख्या दिवस मना लेती, सरकार सीधे सीधे लोकतन्त्र सैनानी सम्मान समारोह का आयोजन करती किंतु संविधान हत्या दिवस यदि सरकारें उसके अधिकारी कर्मचारी बनाने लगेंगे तो कार्यपालिका का संचालन कैसे हो पायेगा। जब वे ही हत्या शब्द को जायज और उचित ठहराते हुए कार्यक्रम का आयोजन करना प्रारंभ कर देंगे तो फिर कैसे कानून का राज कायम हो सकेगा। आपतकाल को कौन उचित और जायज़ ठहराता है? वह तो सर्वथा निंदनीय था और हमेशा रहेगा। लेकिन हत्या शब्द तो सभ्य समाज के शब्दकोश में उचित दृष्टि से देखा और समझा नहीं जाता हैं। हत्या शब्द अपने आप में गैरकानूनी और असंवैधानिक शब्द है और उसी शब्द के साथ कलेक्ट्रेट हॉल में कार्यक्रम का आयोजन संवैधानिक मर्यादो का उल्लंघन है। लोकतंत्र सैनानियों परिजनों का सम्मान होना चाहिए था, संविधान व्याख्या दिवस के बैनर तले, या संविधान आत्मा दिवस के बैनर तले लेकिन दुर्भाग्य की संविधान हत्या दिवस के बैनर तले कार्यक्रम का आयोजन हुआ। राजनीतिक दल आपसी प्रतिद्वंदता में ऐसे शब्दों का चयन भाषणों में नारों में करते है कोई आपत्ति नहीं किन्तु सरकार हत्या शब्द को लेकर कार्यक्र करे, आयोजन में हत्या शब्द का इस्तेमाल करे तो फिर सोचना होगा कि क्या आज आपतकाल की परस्थिति तो निर्मित नहीं होने लगी हैं? आश्चर्य का विषय है कार्यक्रम के आयोजन के लिए केंद्र सरकार के संस्कृति विभाग द्वारा परिपत्र और आदेश जारी हुए है। आपातकाल का संस्कृति विभाग से क्या लेना देना है ? जो कार्य संसदीय कार्य मंत्रालय को करना चाहिए वह संस्कृति विभाग कर रहा है। आखिर मंशा क्या है? जरा सोचिए 2025 में जब आज के कलेक्टर खड़े होकर इसे संविधान की हत्या बताएंगे तो क्या 1975 के कलेक्टर को परोक्ष अपरोक्ष रूप से वे उसे हत्यारा नहीं घोषित कर दे रहे है? कितना गैर जिम्मेदाराना, असंवैधानिक शब्द का उपयोग करते हुए उन सैनानियों का सम्मान किया गया जिन्होंने अपने सर्वस्व जीवन को उस समय लोकतंत्र को बचाने के लिए न्योछावर कर दिया था।वास्तव में सरकार का हत्या शब्द के साथ संविधान को जोड़कर कार्यपालिका से कार्यक्रम का आयोजन करवाना सर्वथा अनुचित असंवैधानिक होने के साथ साथ सभ्य समाज की आत्मा को ठेस पहुंचाने वाला है।
हेमंत चंद्र दुबे बबलू की कलम से
