Betul News:भारत में सम्मान दिए नहीं बांटे और लिए जाते है भाग 6 काश बैतूल की माटी का गरीब किसान दलित का वैज्ञानिक बेटा डॉ प्रकाश भी कोई सम्मान पा पाता

भारत में सम्मान दिए नहीं बांटे और लिए जाते है काश बैतूल की माटी का गरीब किसान दलित का वैज्ञानिक बेटा डॉ प्रकाश भी कोई सम्मान पा पाता

डॉ प्रकाश खातरकर अंटार्टिका में मौसम की विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करते दक्षिण ध्रुव पर ऋणात्मक 55 डिग्री तापमान में 14 महीनों तक 300 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलती बर्फीली तूफानी हवाओं के असहनीय थपेड़ों को झेलते हुए भारतीय वैज्ञानिक दल के साथ अनुसंधान करते चट्टान की भांति खड़ा रहा छह माह दिन, छह माह रात दिशा ज्ञान शून्य ,अत्यंत कठिन यह समझ पाना कि मैं किस दिशा से चला और वापस उसी दिशा में कैसे पहुंचूंगा। मौसम को परास्त किया, देश के लिए, प्रकृति के लिए , पर्यावरण के लिए सार्थक अनुसंधान भी किए , जिसकी वैज्ञानिक खोजों से दूरगामी परिणाम भी प्राप्त हुए होंगे। अत्यंत गरीब परिवार से डॉ प्रकाश ने अपनी मेहनत से कामयाबी की कहानी स्वयं लिखी, जिस इंसान के घर दो वक्त का भोजन भी नहीं स्वयं ने मजदूरी की मां बाप ने मजदूरी की। भौतिक शास्त्र जैसे कठिन विषय में एम सी की उपाधि प्राप्त की, पी एच डी कर डॉक्टरेट भी की, अपने नाम के आगे मेहनत से डॉक्टर प्रकाश खातरकर लगता। नियति ने सम्पूर्ण जीवन में संघर्ष ही संघर्ष लिखा पढ़ाई से लेकर अनुसंधान तक संघर्ष पथरीली राहें? डॉ प्रकाश का क्या सिर्फ यह अपराध की उनकी उपलब्धियों को बताने वाला कोई संगठन नहीं? डॉ प्रकाश का क्या अपराध की उन्होंने ऋणात्मक 55 डिग्री तापमान में रहकर प्रकृति के लिए शोधकार्य किए? डॉ प्रकाश का क्या अपराध की वे कैंसर जैसी जानलेवा दैत्य से संघर्ष करते युवा अवस्था में ही इस दुनिया को अलविदा कह गए? इस देश में जिसका कोई कहने सुनने वाला नहीं वह पद्म सम्मानों से कोसों दूर दक्षिणी ध्रुव पर अकेले ऋणात्मक 55 डिग्री तापमान में रहकर प्रकृति के लिए शोध कार्य कर दुनिया को अलविदा कह देता है। आखिर डॉ प्रकाश इस देश में कब सम्मानों के हकदार बनेंगे जिस देश में सम्मान दिए नहीं बांटे और लिए जाते हैं पोलर मेन डॉ प्रकाश को सादर नमन श्रद्धांजलि

भारत में सम्मान दिए नहीं बांटे और लिए जाते है शृंखला निरन्तर 

नोट _ किसी के प्रति असम्मान नहीं है, जो सम्मानित है उन पर भी हम गर्व करते हैं, उनके कार्य भी जीवन में प्रेरणा प्रदान करते हैं, किन्तु प्रश्न उनका है जिनके लिए बोलने वाला कोई नहीं है आखिर वह सम्मान से दूर क्यों?

हेमंत चंद्र दुबे बबलू बैतूल

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