Betul News:पंडित दीनदयाल जी उपाध्याय भारत रत्न पद्म सम्मान के हकदार नहीं, उनके हिस्से के सम्मान में आया रेलवे स्टेशन का नाम भाग 7
पंडित दीनदयाल जी उपाध्याय भारत रत्न पद्म सम्मान के हकदार नहीं, उनके हिस्से के सम्मान में आया रेलवे स्टेशन का नाम भाग 7

जिन तपस्वियों, मनीषियों ने भारतीय जनसंघ के दीपक की लौ का कठिन परिस्थितियों में , बिना संसाधनों के इस देश में प्रज्वलित किया , वे इस देश में सम्मानों के हकदार नहीं बन सके, लेकिन जो उस दीपक की लौ के साथ सत्ता तक अपने जीवन में काबिज हुए वे सब भारत रत्न पद्म सम्मान पा गए ? अर्थात इससे यह बात स्वय सिद्ध हो जाती है , भारत रत्न पद्म सम्मान सत्ता दिलवाती है, न कि योग्यता,विद्वता, ईमानदारी नैतिकता । उन्हीं में से एक नाम पण्डित दीनदयाल उपाध्याय जी। जो न केवल भारतीय जनसंघ की नींव है, बल्कि उन्होंने दुनिया को एकात्मक मानवतावाद के विचार को दिया जो वास्तव में किसी भी लोककल्याण कारी राज्य को संचालित करने का मौलिक विचार और आधार है। समाज के अंतिम छोर पड़ खड़े व्यक्ति का सामाजिक, आर्थिक उत्थान जो नारा सबसे जोर से लगाया जाता है सबका साथ , साथ सबका विकास उसके मूल में पंडित दीनदयालजी उपाध्याय का एकात्मक मानवतावाद का सिद्धांत ही है, और जिस सिद्धांत को लेकर संगठन आगे बढ़ा सत्ता में आया और जिसके कारण आज सबके हिस्से में सम्मान आए, पद आए ,, वैभव आया उसी सिद्धांत विचार को देने वाले पंडित दीनदयालजी के हिस्से के सम्मान में इस देश में नाम पर आया तो केवल रेलवे स्टेशन का नाम। मुगल सराय रेलवे स्टेशन का नाम गर्व से बदलकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय रेलवे स्टेशन रख दिया गया। मुगल सराय रेलवे स्टेशन का नाम बदला जाना जायज है, लेकिन एक महान विचारक , राष्ट्र वादी नेतृत्व के नाम पर रेलवे स्टेशन का पंडित दीनदयाल जी उपाध्याय के नाम पर रखा जाना? आखिर किसी स्टेशन पर क्या होता है? ट्रेन से यात्री उतरते चढ़ते है, शौच लगे तो यात्रीगण स्टेशन पर शौच करते हैं, तम्बाकू गुटखा खाकर बदतमीजी से पिक थूकते है क्या यह सम्मान एक महान विचारक ,चिंतक,मनीषी के हिस्से आना चाहिए? क्या रेलवे स्टेशन पर बैठकर एकात्मक मानवतावाद पर परिचर्चा , संवाद होता है ? सत्ता में जो आए वे भारत रत्न हो गए और जिस महान विचारक के विचारों को पाकर सत्ता तक पहुंचे , उनके हिस्से के सम्मान में आया रेलवे स्टेशन? देश के सभी सत्ताधीशों सरकारों ने कितनी चतुराई से महान व्यक्तियों , क्रांतिकारियों के नाम से बस स्टैंड, रेलवे स्टेशनों के नाम रख दिए और भारत रत्न पद्म सम्मान अपने नाम से कर लिए । देश की जनता, संगठन के कार्यकर्ताओं ने भी ऐसी ही मांगे सरकारों के सामने रखी,उन्होंने कभी नहीं कहा कि महान विचारक चिंतक पंडित दीनदयाल जी उपाध्याय को भारत रत्न दिया जाएं , उन्होंने तो मांग रखी मुगल सराय रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर पंडित दीनदयाल जी उपाध्याय कर दिया जाएं सरकार के बाप का क्या जाना था, बोर्ड ही तो बदलना था, टिकिट में नाम दूसरा ही तो प्रिंट करना था ? बदल दिया रेलवे स्टेशन का नाम जाओ थूको! आज तक दुनिया के सबसे बड़े संगठन के कार्यकर्ताओं , नेताओं ने नहीं कहा कि पंडित दीनदयाल जी उपाध्याय को भारत रत्न से सम्मानित कर भारत मां के इस लाल को भारत रत्न कहा जाए।आज मै दावे से कहता हूं कि यदि इस देश में अटल बिहारी बाजपेई देश के प्रधानमंत्री नहीं बनते तो उनके हिस्से के सम्मान में भी विदिशा के बस स्टैंड से ज्यादा कुछ नहीं आता। यह है सत्ता का सम्मान देने का असली चेहरा और असली सच। जिन पंडित दीनदयाल जी उपाध्याय की हत्या कर दी गई ,वे राष्ट्र की बलिवेदी पर बलिदानी हो गए, उनके हिस्से के सम्मान में मुगलसराय स्टेशन का परिवर्तित नाम आया,सत्ता केवल सत्ता की नजरिए से पद्म सम्मान और भारत रत्न घोषित करती हैं अन्यथा ऐसा नहीं होता तो पंडित दीनदयाल जी उपाध्याय आज तक कब से भारत रत्न सम्मान नहीं पा जाते , आखिर वे भारत रत्न पद्म सम्मानों से दूर क्यों हैं? कोई सांसद नहीं, कोई विधायक नहीं जो पंडित दीनदयाल जी उपाध्याय का नाम भारत रत्न पद्म सम्मान के लिए आगे बढ़ा देता, हमने तो पद्म सम्मान दिलवाने में रात और दिन उनके लिए एक कर दिए जिन्होंने ने सांसद की टिकट दिलवाई, पंडित दीनदयाल जी उपाध्याय विचारक चिंतक हो सकते है, सांसद की टिकिट थोड़ी ही दिलवा सकते है , अब जिन्होंने सांसद की टिकिट दिलवाने में दिन रात एक कर दिए उन्हीं के लिए तो सम्मान दिलवाने के लिए मेहनत रात दिन की जायेगी, हर किसी को कैसे पद्म सम्मान दिलवा दे?
इसलिए इस देश में सम्मान दिए नहीं बांटे और लिए जाते हैं क्योंकि सत्ता ऐसा ही सोचती है विचार निरन्तर जारी।
नोट जिन्हें सरकारों ने सम्मानित किया है, उनके प्रति हमारा पूरा सम्मान है, उन पर हम गर्व करते हैं, उनके जीवन से प्रेरणा लेते हैं प्रश्न बस इतना सा है दूसरे भी जो उसके हकदार हैं उनके साथ अन्याय न हो, उनके नाम पर केवल बस स्टैंड , रेलवे स्टेशनों के नाम न रखे जाएं।
हेमंत चंद्र दुबे बबलू
