Betul News:नाम का अध्यक्ष, काम भूतपूर्वों का—बैतूल भाजपा में संगठन पंग

सूत्रों की मानें तो बैतूल भाजपा में असमंजस: पवार पहचान बना पाएगा या दब जाएगी?”

नाम का अध्यक्ष, काम भूतपूर्वों का बैतूल भाजपा में संगठन पगु 

सूत्रों की मानें तो बैतूल भाजपा में असमंजस: पवार पहचान बना पाएगा या दब जाएगी?

बैतूल भाजपा में इन दिनों सब “ठीक” चल रहा है कम से कम काग़ज़ों और बयानों में। ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि संगठन नाम का रह गया है और सत्ता भूतपूर्वों के इर्द-गिर्द घूम रही है। अध्यक्ष पद एक औपचारिक कुर्सी बन चुका है, जबकि फैसले वे चेहरे ले रहे हैं जो अतीत में जी रहे हैं, लेकिन वर्तमान को चलाने का दावा रखते हैं।संगठन की बैठकों से लेकर नियुक्तियों तक, हर जगह समानांतर सत्ता की परछाईं साफ़ दिखती है। कार्यकर्ताओं में भ्रम है, दिशा गायब है और जवाबदेही का कोई ठिकाना नहीं। जो संगठन अनुशासन और सामूहिक निर्णय के लिए जाना जाता था, वही अब गुटों और रिमोट कंट्रोल की राजनीति में उलझा नज़र आता है।सवाल यह नहीं कि अध्यक्ष कौन है, सवाल यह है कि संगठन चला कौन रहा है। अगर यही हाल रहा, तो नुकसान विपक्ष नहीं, खुद संगठन को उठाना पड़ेगा और तब “सब ठीक है सरकार जी” सिर्फ़ एक खोखला जुमला बनकर रह जाएगा वही अगर बात करे कि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के गृह जिले बैतूल में संगठन का चेहरा बदला है जिला अध्यक्ष सुधाकर पवार की ताजपोशी के बाद जिस बदलाव की उम्मीद की जा रही थी, वह अब तक पोस्टरों और रंगरोगन से आगे नहीं बढ़ पाई है। संगठन के भीतर यह चर्चा अब दबे शब्दों में नहीं, बल्कि खुलकर होने लगी है कि अध्यक्ष नया है, लेकिन भाजपा जिला इकाई आज भी पुराने भूतपूर्व के इशारों पर चल रही है।पार्टी कार्यालय में नई कुर्सियां जरूर आ गई हैं, लेकिन फैसलों की मेज पर आज भी वही चेहरे बैठे हैं, जिनका औपचारिक पद अब सिर्फ यादों में है। ब्लॉक, मंडल और समितियों की बैठकों में दिशा तय करने का काम वही पुराने नेता कर रहे हैं, जबकि नए अध्यक्ष की भूमिका महज मौजूदगी तक सीमित होकर रह गई है।कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह स्थिति अब असहनीय होती जा रही है। जो लोग नए नेतृत्व से उम्मीद लगाए थे, वे खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। संगठन में यह संदेश तेजी से फैल रहा है कि भाजपा में पद बदले जा सकते हैं, लेकिन सत्ता का ढांचा अटल है।सूत्र बताते हैं कि सुधाकर पवार जब जिला अध्यक्ष बने, तो संगठन में नई ऊर्जा भरने का सपना लेकर आए थे। गांव-गांव घूमकर कार्यकर्ताओं से मिले, नई टीम बनाने के संकेत दिए और जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने की बात कही। लेकिन हर कोशिश पर जैसे अदृश्य दीवार खड़ी हो गई। ब्लॉक से लेकर मंडल स्तर तक वही पुराने नाम, वही पुराने चेहरे, वही पुराने समीकरण। नए लोगों को मौका मिलने की उम्मीद लगाए बैठे कार्यकर्ता धीरे-धीरे हताश होते जा रहे हैं।

इस पूरे राजनीतिक ड्रामे के केंद्र में हैं भाजपा के पूर्व जिला अध्यक्ष ? पार्टी में उनकी मजबूत पकड़ किसी से छिपी नहीं है। कहा जा रहा है कि अपनी राजनीतिक पहुंच और पुराने नेटवर्क के दम पर उन्होंने जिला संगठन से लेकर मंडल संगठन तक अपनी पसंद के लोगों को ही आगे बढ़ाया है। नतीजा यह हुआ कि नया अध्यक्ष होते हुए भी सुधाकर पवार अपनी ही टीम चुनने में खुद को असमर्थ रहे हैं। संगठन में यह चर्चा आम हो गई है कि अध्यक्ष तो नया है, लेकिन सत्ता की पटकथा अब भी पुरानी ही चल रही है।

हालात इतने तल्ख हो चुके हैं कि सुधाकर पवार ने अपनी पीड़ा कुछ स्थानीय और प्रदेश के अखबारो दफ्तरों तक भी पहुंचाई। सूत्रों के मुताबिक, उन्होंने निजी बातचीत में संगठन के भीतर चल रही खींचतान और अपनी मजबूरी साझा की, लेकिन राजनीतिक दबाव और परिस्थितियों के चलते किसी ने भी खुलकर इसे छापने का साहस नहीं किया। अब वही बातें गुपचुप चौक-चौराहों, पान ठेलों और चाय दुकानों पर चटकारे लेकर सुनाई जा रही हैं। लोग कहते हैं पवार अच्छे आदमी हैं, पर संगठन में अकेले पड़ गए हैं।पार्टी कार्यालय में बैठकों का माहौल भी बदला-बदला सा है। कई बार ऐसा होता है कि नए अध्यक्ष मौजूद रहते हैं, लेकिन चर्चा और फैसलों की दिशा पुराने नेता तय करते हैं। नए पदाधिकारी खुद को हाशिये पर महसूस करते हैं और पुराने चेहरे बिना किसी औपचारिक जिम्मेदारी के भी पूरे आत्मविश्वास के साथ बैठकें संचालित करते नजर आते हैं। इससे कार्यकर्ताओं में यह संदेश जा रहा है कि नेतृत्व बदला जरूर है, लेकिन व्यवस्था वही पुरानी है।दिलचस्प बात यह है कि सुधाकर पवार भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के बेहद करीबी और विश्वासपात्र माने जाते हैं। यही वजह है कि कार्यकर्ताओं को उनसे बड़ी उम्मीदें थीं। माना जा रहा था कि प्रदेश नेतृत्व का भरोसा उन्हें संगठन में मजबूती देगा, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। पुराने समीकरण इतने मजबूत हैं कि नए अध्यक्ष की राह में हर कदम पर रोड़े अटक रहे हैं।प्रदेश अध्यक्ष के गृह जिले में इस तरह की स्थिति बनना पार्टी के लिए भी शुभ संकेत नहीं माना जा रहा। आमतौर पर यह जिला संगठनात्मक अनुशासन और मजबूती का उदाहरण माना जाता रहा है, लेकिन अब यहां अंदरूनी कलह खुलकर सामने आ रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि नए नेतृत्व को खुलकर काम करने का मौका नहीं मिला, तो इसका असर आगामी चुनावी तैयारियों पर भी पड़ सकता है। कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटना किसी भी पार्टी के लिए सबसे बड़ा खतरा होता है।भाजपा कार्यालय में इन दिनों रंगरोगन हो रहा है, नई कुर्सियां लग रही हैं, पोस्टरों पर नए चेहरे चमक रहे हैं, लेकिन अंदरूनी व्यवस्था में बदलाव की चमक अब तक दिखाई नहीं दे रही। सुधाकर पवार की हालत उस कप्तान जैसी बताई जा रही है, जिसके हाथ में टीम की जिम्मेदारी तो है, लेकिन खिलाड़ी चुनने का अधिकार किसी और के पास है। यही वजह है कि वे कई बार मुस्कराते हुए भी भीतर से टूटे हुए नजर आते हैं।अब सवाल यह है कि क्या सुधाकर पवार इस राजनीतिक भूलभुलैया से निकलकर संगठन को नई दिशा दे पाएंगे, या फिर वे भी पुराने ढांचे के भीतर ही सीमित होकर रह जाएंगे? क्या प्रदेश नेतृत्व इस स्थिति में हस्तक्षेप करेगा, या फिर बैतूल भाजपा की यह अंदरूनी लड़ाई यूं ही कार्यकर्ताओं के मनोबल को कमजोर करती रहेगी?फिलहाल तो स्थिति यही है कि भाजपा कार्यालय में हलचल तो बहुत है, लेकिन बदलाव की आहट अब तक दूर-दूर तक सुनाई नहीं दे रही। संगठन के गलियारों में एक ही सवाल गूंज रहा है — क्या नया अध्यक्ष अपनी पहचान बना पाएगा, या फिर “भूतों के ढेरे” में उसकी आवाज भी कहीं गुम होकर रह जाएगी?

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