Betul News:मंडल भी देख रहे, कमंडल भी देख रहे… अब ‘गु-गोबर को’ देखने को मजबूर होगे कार्यकर्ता!
मंडल भी देख रहे, कमंडल भी देख रहे… अब ‘गु-गोबर को’ देखने को मजबूर होगे कार्यकर्ता!

बैतूल। राजनीति में समय-समय पर कई प्रयोग हुए हैं। कभी मंडल ने सत्ता के समीकरण बदले, तो कभी कमंडल ने चुनावी दिशा तय की। दोनों के अपने समर्थक, अपनी विचारधारा और अपना राजनीतिक आधार बना कर चल रहे, लेकिन बैतूल की राजनीति में इन दिनों एक नए प्रयोग की चर्चा है, जिसने संगठन के भीतर और बाहर दोनों जगह सवाल खड़े कर दिए हैं।सवाल किसी एक नियुक्ति या एक चेहरे का नहीं है। सवाल उस संदेश का है, जो उन कार्यकर्ताओं तक पहुंच रहा है जिन्होंने वर्षों तक पार्टी का झंडा उठाया, विरोध सहा, चुनावी संघर्षों में पसीना बहाया और संगठन की नींव मजबूत करने में अपनी भूमिका निभाई। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि संगठन में अब निष्ठा, संघर्ष और समर्पण से ज्यादा महत्व समीकरणों और अवसरों को मिलने लगा है। जिन कार्यकर्ताओं ने वर्षों तक संगठन के लिए काम किया, वे आज खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं, जबकि संगठन को गाली देने वाले ठरकी हलकट जो महिलाओं को गंदे गंदे मैसेज करने ऐसे हलकट चेहरे को युवा मोर्चा जिला अध्यक्ष बनाने की तैयारी हो रही है। चौराहों और राजनीतिक बैठकों में एक ही सवाल गूंज रहा है क्या अब संगठन में योगदान का पैमाना बदल गया है? क्या विचारधारा और समर्पण की जगह अब राजनीतिक उपयोगिता और समीकरणों ने ले ली है? पुराने कार्यकर्ताओं की नाराजगी का कारण भी यही बताया जा रहा है। उनका मानना है कि यदि संघर्ष करने वालों की जगह अवसर देखकर आने वालों को प्राथमिकता मिलेगी, तो संगठन की रीढ़ माने जाने वाले कार्यकर्ताओं का मनोबल प्रभावित होना स्वाभाविक है।राजनीतिक विश्लेषक भी मानते हैं कि चुनाव केवल बड़े नेताओं के भाषणों से नहीं जीते जाते। चुनाव की असली ताकत बूथ स्तर का कार्यकर्ता होता है। यदि वही कार्यकर्ता उपेक्षित महसूस करने लगे, तो उसका असर भविष्य की चुनावी तैयारियों पर पड़ सकता है।यही कारण है कि अब 2029 की चर्चा भी शुरू हो गई है। कार्यकर्ता पूछ रहे हैं कि क्या वर्तमान प्रयोग संगठन को मजबूत करेंगे या फिर भविष्य में नई चुनौतियां खड़ी करेंगे? फिलहाल बैतूल की राजनीति में लोगों की जबान पर बस एक ही सवाल और बहस जारी है। नेतृत्व इसे संगठन विस्तार का हिस्सा मान सकता है, लेकिन जमीन पर कार्यकर्ताओं के बीच उठ रहे सवाल यह संकेत दे रहे हैं कि केवल पद बांटने से संगठन मजबूत नहीं होता, बल्कि कार्यकर्ताओं का विश्वास बनाए रखने से होता है।क्योंकि राजनीति में जनता सब देखती है, कार्यकर्ता सब याद रखता है।
नोट यह खबर एक मनोरंजन के तौर पर बनाई गई है।
