populationcontrol law:जनसंख्या नियंत्रण कानून” बनाकर अविलंब लागू करने की मांग को लेकर प्रधानमंत्री के नाम कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा
जनसंख्या नियंत्रण कानून” बनाकर अविलंब लागू करने की मांग को लेकर प्रधानमंत्री के नाम कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा

जनसंख्या फाउंडेशन जिला इकाई द्वारा जनसंख्या विस्फोट एवं जनसंख्याकीय संतुलन के कारण भारत राष्ट्र के समक्ष उत्पादन चुनौतियों के लिए जनसंख्या निरंतर कानून बनाकर अवलंब लागू करने की मांग को लेकर जनसंख्या फाउंडेशन बैतूल जिला अध्यक्ष माधुरी सावले एवं जिला संयोजक साक्षी शर्मा के नेतृत्व में महिलाओं ने कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर माननीय प्रधानमंत्री के नाम जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंप कर कहा कि जनसंख्या निरंतरण के लिए भारत सरकार आवश्यक कदम उठाकर कार्रवाई करें। जनसंख्या फाउंडेशन जिला संयोजक साक्षी शर्मा ने महिलाओं के साथ माननीय प्रधानमंत्री के नाम कलेक्टर को ज्ञापन देते हुए कहा कि हाल ही में सम्पन्न लोकसभा चुनावों में आपके नेतृत्व में लगातार तीसरी बार बनी सरकार का प्रतिनिधित्व करने के लिए आपको “जनसंख्या समाधान फाउन्डेशन” की ओर से बधाई एवं शुभकामनाएं।भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर अब तक लगभग 77 वर्ष की अवधि में भारत ने प्रत्येक क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। खाद्यान अनुपलब्धता से लेकर खाद्यान आत्मनिर्भरता एवं निर्यात तक तथा बांध बनाने से लेकर चाँद पर पहुँचने तक विकास की लंबी यात्रा हमने तय की है। परन्तु 1952 में विश्व में सर्वप्रथम परिवार नियोजन कार्यक्रम प्रारम्भ करने वाले भारत में सुरसा के मुंह की तरह बढ़कर 143 करोड़ के आँकड़े को पार कर चुकी जनसंख्या के कारण यह विकास ऊँट के मुँह में जीरे के समान साबित हो रहा है।विश्व के मात्र 2.4% भू-भाग पर विश्व की कुल लगभग 800 करोड़ जनसंख्या के 17.8% अर्थात 143 करोड़ से अधिक आबादी का भार वहन कर रहे भारत में जनसंख्या विस्फोट से उत्पन्न संसाधन, सामाजिक, आर्थिक एवं पर्यावरणीय संकट तथा जनसांख्यिकीय असंतुलन के कारण पल-प्रतिपल गृहयुद्ध की आशंका बढ़ रही है। माननीय प्रधानमंत्री के नाम दिए गए ज्ञापन में जनसंख्या फाउंडेशन की महिला पद अधिकारियों ने कहा कि सरकार जनसंख्या के उचित समाधान के लिए ऐसा कानून बनाए जिसमें भ्रम की स्थिति ना रहे और जाति, धर्म, क्षेत्र व भाषायी बंधनों से ऊपर उठकर, राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए यह कानून देश के सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू हो। इस कानून के सभी दंडात्मक प्रावधान कानून अधिसूचित होने की तिथि के एक वर्ष के पश्चात कानून तोड़कर दूसरी जीवित संतान से अधिक बच्चे की उत्पत्ति करने वाले जैविक माता-पिता पर लागू हों। कानून बनने के पूर्व में उत्पन्न दो से अधिक संतानों के मामले में किसी भी नागरिक पर किसी भी रूप में यह कानून लागू नहीं होगा।.जनसंख्या समाधान विषयक कानून अधिसूचित होने की तिथि के एक वर्ष के पश्चात कानून तोड़कर दूसरी से अधिक संतान उत्पन्न करने वाले दंपत्ति को सरकार द्वारा मिलने वाली सभी प्रकार की सहायता एवं अनुदान आदि समाप्त किए जाने का प्रावधान कानून में किया जाए।वर्तमान में राजकीय सेवा में नियोजित, दो या दो से अधिक बच्चों वाले माता-पिता सरकार द्वारा कानून अधिसूचित होने की तिथि के एक वर्ष के पश्चात कानून तोड़कर अगली संतान की उत्पत्ति करने पर अपने पद पर नहीं बने रह सके तथा भविष्य में नियोजित किए जाने की पात्रता भी समाप्त हो जाए, ऐसा प्रावधान कानून में किया जाए.कानून अधिसूचित होने की तिथि के एक वर्ष के पश्चात कानून तोड़कर दूसरी से अधिक संतान उत्पन्न करने वाले जैविक माता-पिता व संतान को जीवन पर्यन्त मताधिकार एवं किसी भी प्रकार की चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने से वंचित किया जाए। कानून का एक बार उल्लंघन करने के बाद दोबारा उल्लंघन करने अर्थात चौथी संतान की उत्पत्ति की स्थिति में पिछले प्रावधानों के साथ-साथ ऐसे दंपत्ति (पति-पत्नी दोनों) की अनिवार्य नसबंदी करके उनको 10 वर्ष की जेल की सजा का प्रावधान किया जाए ताकि चौथी संतान के बारे में कोई नागरिक स्वप्न में भी ना सोच सके। दंपत्ति को प्रथम बार में जुड़वाँ संतान उत्पन्न होने की स्थिति में परिवार पूर्ण माना जाए और अगली संतान की उत्पत्ति कानून का उल्लंघन मानी जाए। दूसरे बच्चे के समय जुड़वाँ संतान होना एक अपवाद मानकर ऐसी स्थिति में कानून प्रभावी ना हो। जाति, धर्म व संप्रदायों से ऊपर उठकर यह प्रावधान स्पष्ट रूप से रहे कि पहली शादी से दो जीवित संतानों के साथ तलाक होने की स्थिति में स्त्री या पुरुष में से कोई भी दूसरी शादी के बाद संतानोत्पत्ति के अधिकारी नहीं रहेंगे, भले ही दूसरे जीवनसाथी को पहले से अथवा पहली शादी से कोई संतान ना हो। अगर एक बच्चा हो तो केवल एक बच्चे कीउत्पत्ति का अधिकार रहे।बहुविवाह (एक से अधिक पत्नी) एवं बहुपतित्व विवाहों के मामले में कहीं कोई भ्रम कीस्थिति नहीं रहनी चाहिए। अगर कानूनन भी कोई पुरुष एक से अधिक पत्नी रखता है और उन्हें तलाक देकर अदल-बदल करते हुए अपने जीवनकाल में अनेक शादियां करता है तो उसे सभी पत्नियों के माध्यम से अलग अलग दो-दो बच्चे पैदा करने की छूट नहीं दी जा सकती। किसी एक अथवा दो पत्नियों से कुल दो बच्चों की उत्पत्ति पर (पत्नियों अथवा पतियों की संख्या जो भी हो) परिवार पूर्ण माना जाए। कुल मिलाकर पत्नियों अथवा पतियों की संख्या कितनी भी क्यों ना हो, उसे एक परिवार मानते हुए बच्चों की कुल संख्या 2 से अधिक होना कानून का उल्लंघन माना जाए। पूर्वोत्तर भारत के राज्यों असम, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम, मणिपुर, मेघालय एवं त्रिपुरा तथा बिहार, झारखण्ड, उड़ीसा एवं छत्तीसगढ सहित सभी आदिवासी राज्यों की मूल धार्मिक जनजातियों की जनसंख्या अवैध घुसपैठ के कारण अनुपातिक रूप से घटते जाने के कारण कुछ निश्चित समय के लिए वहां की मूल धार्मिक जनजातियों को जनसंख्या नियंत्रण कानून की परिधि से बाहर रखा जाए। अवैध घुसपैठ के पश्चात स्थानीय लड़कियों से शादी करके वहीं बस जाने वाले किसी भी बाहरी व्यक्ति / घुसपैठियों को किसी प्रकार की छूट नहीं मिलनी चाहिए। उपरोक्त प्रावधानों के क्रियान्वयन हेतु आवश्यक होने पर संविधान में उपयुक्त संशोधन किया जाए।जनसंख्या विस्फोट एवं जनसांख्यिकीय असंतुलन पर कुशल एवं प्रभावी नियंत्रण भारत ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व और समूची मानवता के लिए अत्यन्त आवश्यक है। ज्ञापन सौंपने वाली महिलाओं में जिला अध्यक्ष माधुरी सावले, कृष्ना अमृते, आरती शुक्ला, शारदा पाटिल ममता यादव कल्पना मांझी रानू चौरसिया सोनम मिश्रा साक्षी शर्मा संयोजक शामिल थी।
