Betul News:एसपी के साथ फोटो क्या खिंचवाई… कुछ सोशल मीडिया क्रिएटर खुद को बादशाह समझ बैठे!

एसपी के साथ फोटो क्या खिंचवाई… कुछ सोशल मीडिया क्रिएटर खुद को बादशाह समझ बैठे!

बैतूल। कहते हैं कि तस्वीरें बहुत कुछ बयां करती हैं, लेकिन बैतूल में कुछ तस्वीरों ने तो कमाल ही कर दिया। पुलिस अधीक्षक के साथ एक फोटो क्या खिंच गई, कुछ सोशल मीडिया क्रिएटरों को ऐसा लगा मानो उन्हें जिले की डिजिटल सल्तनत का ताज पहनाया गया हो।इसके बाद सोशल मीडिया पर अंदाज़ ऐसा, जैसे कानून की किताब अब रील और स्टोरी से चलेगी। बात-बात पर रौब, हर पोस्ट में प्रभाव का प्रदर्शन और हर आलोचना का जवाब तथ्यों से नहीं, बल्कि दबाव की भाषा में देने की कोशिश क्या यही जिम्मेदार कंटेंट क्रिएटर की पहचान है? विडंबना यह है कि जिस सम्मान का उद्देश्य समाज में सकारात्मक संदेश देना था, उसे कुछ लोगों ने अपनी निजी ब्रांडिंग का पोस्टर बना लिया।

सवाल यह नहीं कि फोटो किसके साथ खिंची, सवाल यह है कि उस फोटो का इस्तेमाल किस सोच के साथ किया गया। आज सोशल मीडिया पर एक नई बीमारी तेजी से फैल रही है व्यूज़ पहले, सत्य बाद में। खबर सही है या गलत, इसकी जांच बाद में होगी; पहले रील अपलोड होनी चाहिए। तथ्य कम, ड्रामा ज्यादा। जिम्मेदारी कम, लोकप्रियता की भूख ज्यादा। और सबसे दुखद बात तब होती है, जब कुछ लोग खुद को पत्रकार भी घोषित कर देते हैं। पत्रकारिता कैमरे से नहीं, चरित्र से होती है। माइक्रोफोन पकड़ लेने या इंस्टाग्राम पर लाखों व्यूज़ आ जाने से कोई पत्रकार नहीं बन जाता। पत्रकारिता का पहला नियम है तथ्य, संतुलन और जवाबदेही।अब सवाल पुलिस प्रशासन से भी है। यदि किसी सरकारी मंच, सम्मान या अधिकारियों के साथ तस्वीरों का इस्तेमाल निजी प्रभाव जमाने, लोगों पर रौब दिखाने या भ्रम फैलाने के लिए किया जा रहा है, तो क्या इस पर कोई मर्यादा तय नहीं होनी चाहिए? सम्मान जिम्मेदारी बढ़ाता है, विशेषाधिकार नहीं देता। याद रखिए फोटो से पहचान नहीं बनती व्यवहार से बनती है। जो सच से घबराता है, वह आलोचकों को ब्लॉक कर सकता है, लेकिन सवालों को नहीं। और जो लोकप्रियता के नशे में खुद को कानून से ऊपर समझने लगे, उसे समय अक्सर आईना जरूर दिखाता है। वही तस्वीरें फ्रेम में अच्छी लगती हैं, लेकिन चरित्र इतिहास में लिखा जाता है।रीलों से भीड़ मिल सकती है, लेकिन सम्मान केवल आचरण से मिलता है।और सच वह न किसी ब्लॉक लिस्ट से डरता है, न किसी डिजिटल दरबार से।यदि एक फोटो से कोई बादशाह बन जाता, तो हर सरकारी कार्यक्रम के समूह फोटो में पूरा जिला राजा कहलाता।

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