Betul News:बीएलओ की जिम्मेदारी से त्रस्त आंगनबाड़ी कार्यकर्ता पहुंची एसडीएम कार्यालय एसडीएम को सौंपा ज्ञापन
बीएलओ की जिम्मेदारी से त्रस्त आंगनबाड़ी कार्यकर्ता पहुंची एसडीएम कार्यालय एसडीएम को सौंपा ज्ञापन

बैतूल। महिला और बाल विकास विभाग की रीढ़ कही जाने वाली आंगनबाड़ी कार्यकर्ता आज खुद सिस्टम से त्रस्त हैं। एक तरफ शासन-प्रशासन उनके कंधों पर दर्जनों विभागों का काम लाद रहा है, वहीं दूसरी तरफ बीएलओ की जिम्मेदारी भी थोप दी गई है। अपने अधिकारों की रक्षा और अतिरिक्त कार्यों से मुक्ति की मांग को लेकर बैतूल की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता अब लामबंद हो गई हैं।ग्रामीण परियोजना की आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का एक प्रतिनिधिमंडल शुक्रवार 10 जुलाई को आंगनबाड़ी कार्यकर्ता सहायिका एकता यूनियन के संरक्षक कुंदन राजपाल के नेतृत्व में बैतूल एसडीएम मकसूद अहमद से मिला। उन्होंने गत दिनों निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण अधिकारी बैतूल विधानसभा द्वारा जारी 82 आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को बीएलओ पद पर नियुक्त करने के आदेश को रद्द करने की मांग को लेकर ज्ञापन सौंपा।ज्ञापन में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने कहा कि हम महिला बाल विकास विभाग में मानदेय पर कार्यरत हैं और हमारे ऊपर पहले से ही इतने कार्यों का दबाव है कि हम शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित महसूस कर रहे हैं। विभाग की तरफ से पोषण ट्रैकर, ई-केवाईसी, एफआरएस, संपर्क एप, भोजन उपस्थिति दर्ज करना, कुपोषित बच्चों को एनआरसी में भर्ती कराना, टीकाकरण, समग्र आईडी बनवाना, आधार अपडेट जैसे दर्जनों कार्य करवाए जा रहे हैं। इसके अलावा विभिन्न योजनाओं जैसे मातृ वंदना योजना, लाड़ली लक्ष्मी योजना में हितग्राहियों को बैंक ले जाकर डीबीटी और पीएनसीआई करवाना, गर्भवती महिलाओं के बैंक खाते खुलवाना जैसे कार्य भी दिए जा रहे हैं।
केवाईसी का कार्य करवाने का दबाव
उन्होंने कहा कि पंचायत विभाग के सचिव और रोजगार सहायकों द्वारा भी अब केवाईसी का कार्य करवाने का दबाव डाला जा रहा है, जिससे परिवार को समय देना असंभव हो गया है। इस स्थिति में निर्वाचन कार्य बीएलओ का अतिरिक्त भार देना मानसिक शोषण जैसा है। यूनियन ने निर्वाचन आयोग नई दिल्ली और राज्य निर्वाचन पदाधिकारी से भी अनुरोध किया है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं से बीएलओ का कार्य न लिया जाए। महिला बाल विकास मंत्रालय, वल्लभ भवन द्वारा भी निर्वाचन पदाधिकारी भोपाल को पत्र भेजकर स्पष्ट निर्देश दिए जा चुके हैं कि महिला एवं बाल विकास की कार्यकर्ताओं से अन्य विभागीय कार्य नहीं लिया जाए। यहां तक कि उच्च न्यायालय जबलपुर ने भी बच्चों में कुपोषण को देखते हुए आदेश दिया है कि महिला एवं बाल विकास विभाग की कार्यकर्ताओं से अन्य विभागीय कार्य न करवाए जाएं। फिर भी शासन-प्रशासन के हिटलरशाही रवैये के कारण आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को अपने मूल कार्यों के साथ-साथ अन्य विभागीय कार्यों के लिए बाध्य किया जा रहा है, जिससे वे मानसिक रूप से टूट रही हैं। यूनियन ने मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री से भी अपील की है कि उनका शोषण रोका जाए, न्यूनतम वेतन सुनिश्चित किया जाए और उन्हें शासकीय कर्मचारी का दर्जा दिया जाए।
