Betul News:एबीवीपी के आगे प्रशासन नतमस्तक? कानून की धार आखिर कुंद क्यों!
कलेक्टर कार्यालय से कॉलेज तक हंगामा... फिर भी कार्रवाई के नाम पर सन्नाटा! छात्र राजनीति की आड़ में कथित दबंगई पर प्रशासन की चुप्पी ने खड़े किए बड़े सवाल
एबीवीपी के आगे प्रशासन नतमस्तक? कानून की धार आखिर कुंद क्यों!
कलेक्टर कार्यालय से कॉलेज तक हंगामा… फिर भी कार्रवाई के नाम पर सन्नाटा! छात्र राजनीति की आड़ में कथित दबंगई पर प्रशासन की चुप्पी ने खड़े किए बड़े सवाल

बैतूल। छात्र राजनीति को लोकतंत्र की पाठशाला कहा जाता है, लेकिन जब आंदोलन की जगह हंगामा, संवाद की जगह कथित अभद्रता और लोकतांत्रिक विरोध की जगह दबाव की राजनीति दिखाई देने लगे तो सवाल उठना स्वाभाविक है। बैतूल में एबीवीपी से जुड़े कार्यकर्ताओं को लेकर सामने आने वाले विवादों ने अब संगठन के साथ साथ प्रशासन की भूमिका पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पिछले कुछ वर्षों में एबीवीपी से जुड़े कार्यकर्ताओं के सरकारी कार्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में विवादों में आने की घटनाएं चर्चा में रही हैं। कुछ वर्ष पहले जामठी रोड पर हंगामा किया था। उस समय कांग्रेस के पूर्व विधायक निलय डागा द्वारा आंदोलन कर रहे छात्र संगठन को शिक्षा का पाठ पढ़ाया था लेकिन कुछ दलाल टाईप के मीडिया ने उसे भी तोड़ मरोड़ कर पेश किया था अगर उस समय दलाल मीडिया सही खबर लिखती तो शायद आज छात्र संगठन जो उत्पाद जिले में मचा रहा है, आज ये मर्यादा में करते,इसके बावजूद यदि ऐसी परिस्थितियां दोबारा सामने आती हैं तो सवाल उठता है कि पिछली घटनाओं से प्रशासन ने आखिर क्या सबक लिया? मामला केवल सड़क या कॉलेज परिसर तक सीमित रहने का भी आरोप नहीं है। पूर्व में कलेक्टर कार्यालय में छात्र संगठन के कार्यकर्ताओं द्वारा प्रवेश कर हंगामा किए जाने की घटना भी सामने आई थी। उस दौरान धक्का-मुक्की के बीच एक पुलिसकर्मी के गिरने की बात भी सामने आई थी। अब सवाल यह है कि ऐसे मामलों में कितनी निष्पक्ष जांच हुई?या फिर सरकारी कार्यालय की चौखट पर पहुंचते ही कानून की धार थोड़ी और नरम हो जाती है? मुल्ताई में अभी हाल ही एक शिक्षक के साथ कथित गाली-गलौज और अभद्रता के एवीबीपी छात्र संगठन के द्वारा किया गया तो वही अब लोगों के मन में कई सवाल छात्र राजनीति की मर्यादा पर उठ रहे है। छात्र संगठन किसी भी मुद्दे पर आंदोलन कर सकते हैं, प्रशासन से सवाल पूछ सकते हैं और अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर सकते हैं। यह लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन शिक्षक के साथ कथित दुर्व्यवहार, गाली-गलौज या दबाव बनाने के आरोपों को किसी भी स्थिति में छात्र राजनीति की उपलब्धि नहीं कहा जा सकता। आखिर विद्यार्थी और शिक्षक का रिश्ता सम्मान और संवाद पर टिका होता है। यदि इसी रिश्ते की मर्यादा टूटने लगे तो फिर सवाल केवल एक संगठन पर नहीं, बल्कि पूरे छात्र आंदोलन की दिशा पर उठता है। वीडियो में देखा जा सकता है कि किस तरह एक शिक्षक को बोला जा रहा है!
बैतूल में सबसे बड़ा सवाल अब प्रशासन की निष्पक्षता को लेकर है। आम नागरिक द्वारा सरकारी कर्मचारी से अभद्रता करने या सरकारी कार्यालय में हंगामा करने पर पुलिस और प्रशासन किस तरह कार्रवाई करते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है।
सत्ता का संरक्षण या प्रशासन का संकोच?
विरोधी पक्ष अक्सर आरोप लगाता है कि सत्ता से नजदीकी रखने वाले संगठनों पर प्रशासन कार्रवाई करने में संकोच करता है। ऐसे आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन जब किसी संगठन से जुड़े विवाद बार-बार सार्वजनिक चर्चा का विषय बनें और कार्रवाई को लेकर सवाल उठें तो प्रशासन का कर्तव है कि वह स्थिति स्पष्ट करे। क्योंकि प्रशासन की चुप्पी कई बार उन सवालों को और बड़ा कर देती है, जिन्हें एक स्पष्ट कार्रवाई या स्पष्टीकरण आसानी से खत्म कर सकता है।एबीवीपी हो या कोई अन्य छात्र संगठन किसी संगठन की राजनीतिक पहचान उसे कानून से ऊपर नहीं कर सकती। छात्र राजनीति का असली प्रभाव पोस्टर, नारे या भीड़ में नहीं, बल्कि विचार और तर्क में दिखाई देना चाहिए। कॉलेज में आंदोलन हो, लेकिन शिक्षा का माहौल न बिगड़े। सरकारी कार्यालय में ज्ञापन हो, लेकिन सरकारी व्यवस्था बाधित न हो अधिकारी से सवाल हो, लेकिन अभद्रता नहीं। शिक्षक से मतभेद हो, लेकिन सम्मान की सीमा न टूटे।बैतूल प्रशासन के सामने सवाल बेहद स्पष्ट है सरकारी कार्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में हंगामे के आरोपों की निष्पक्ष जांच कब होगी? शिक्षक से कथित अभद्रता के मामले जो वीडियो वारयल हो रहा है उसके आधार पर कारवाई क्यों नहीं, बैतूल कलेक्टर कार्यालय में घुसकर उत्पाद मचाया था तब भी वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ लेकिन कार्रवाई शून्य आखिर कब जिम्मेदारी तय होगी? और सबसे महत्वपूर्ण क्या कानून सभी संगठनों और सभी नागरिकों के लिए समान रूप से लागू होगा?क्योंकि लोकतंत्र में छात्र संगठन महत्वपूर्ण हो सकते हैं, राजनीतिक विचारधारा महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन कानून से बड़ा कोई संगठन नहीं हो सकता। और अगर प्रशासन सचमुच निष्पक्ष है तो उसे यह साबित करने के लिए किसी बयान की नहीं, समान कार्रवाई की जरूरत है।
कानून से ऊपर कोई संगठन नहीं और शिक्षक के सम्मान से बड़ा कोई आंदोलन नहीं।
