Politics News:जयस का मंच और कांग्रेस के चेहरे क्या बैतूल की सियासत में फिर बिछ रही नई बिसात? कांग्रेस के चुनिंदा चेहरे, रणनीति, मजबूरी या नई पटकथा!
अखिर यह रिश्ता क्या कहलाता है जयस और कॉंग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष गुट के नेता एक मंच पर!
जयस का मंच और कांग्रेस के चेहरे क्या बैतूल की सियासत में फिर बिछ रही नई बिसात? कांग्रेस के चुनिंदा चेहरे, रणनीति, मजबूरी या नई पटकथा!
अखिर यह रिश्ता क्या कहलाता है जयस और कॉंग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष गुट के नेता एक मंच पर!

बैतूल। भीमपुर का एक सांस्कृतिक कार्यक्रम अचानक जिले की राजनीति का विस्फोटक केंद्र बन जाएगा, शायद इसकी कल्पना आयोजकों ने भी नहीं की होगी। 1 मार्च को जयस के नेतृत्व में आयोजित कार्यक्रम ने अब राजनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया है। यही वह संगठन है जिसने पिछले विधानसभा चुनाव में जिले की. बैतूल,भैंसदेही,और. घोड़ाडोंगरी सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारकर कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवारों की राह रोकी थी। राजनीतिक विश्लेषण साफ कहता है कि जयस की सक्रियता ने कांग्रेस की संभावनाओं को सीधा नुकसान पहुंचाया। ऐसे में सवाल उठता है कि जिस मंच ने हार की पटकथा लिखी, उसी मंच पर कांग्रेस के चुनिंदा चेहरे पूर्व मंत्री सुखदेव पांसे लोकसभा प्रत्याशी रामू टेकाम एवं पूर्व कॉंग्रेस जिलाध्यक्ष हेमंत वागदरें क्यों दिखाई दिए।पिछले विधानसभा चुनाव में पांचों सीटों पर कांग्रेस को पराजय का सामना करना पड़ा। जयस के प्रत्याशियों ने वोटों का समीकरण इस तरह बदला कि कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत सकी। यह तथ्य प्रदेश कांग्रेस के भीतर लंबे समय तक बहस का विषय रहा। इसलिए जब भीमपुर के इस कार्यक्रम में कांग्रेस नेताओं को निमंत्रण मिला, तो सबकी नजरें इस बात पर थीं कि कौन जाएगा और कौन दूरी बनाए रखेगा।
कांग्रेस के तीन नेता पहुंचे, बाकियों ने बनाई दूरी
भैंसदेही विधायक धरमुसिंह सिरसाम, घोड़ाडोंगरी विधायक ब्रह्मा भलावी और जिला कांग्रेस अध्यक्ष निलय डागा सहित जिला कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ सदस्य कार्यकर्ताओं ने जहां कार्यक्रम से दूरी बनाई। वहीं पूर्व विधायक एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री सुखदेव पांसे, पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष हेमंत वागद्रे और रामू टेकाम की उपस्थिति ने सियासी तापमान बढ़ा दिया। पार्टी के भीतर चर्चा है कि क्या यह महज सामाजिक शिष्टाचार था या किसी बड़े राजनीतिक समीकरण की आहट। जिस संगठन को कांग्रेस की हार का कारण माना गया, उसके मंच पर इन नेताओं की मौजूदगी कार्यकर्ताओं के गले नहीं उतर रही।
कही भीतरघात की परछाईं तो नहीं!
अब जिले की राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी आम हो गई है कि कहीं पिछले चुनाव में जयस के प्रत्याशियों को खड़ा करवाने में कांग्रेस के ही इन नेताओं की भूमिका तो नहीं रही। यह चर्चा नई नहीं है, लेकिन भीमपुर के इस मंच ने उसे फिर जिंदा कर दिया है। जिला पंचायत चुनाव से लेकर विधानसभा चुनाव तक कांग्रेस को जो नुकसान हुआ, उसे केवल बाहरी चुनौती कहकर टाला नहीं जा सकता। अंदरूनी सांठगांठ की आशंकाएं अब खुलकर सामने आ रही हैं।
प्रदेश नेतृत्व की रणनीति पर सवाल
सियासी हलकों में यह भी चर्चा है कि क्या प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी जयस के साथ नए समीकरण साधने की कोशिश कर रहे हैं। क्या यह संगठन को साधने की रणनीति है या उसे भीतर से तोड़ने की? यदि ऐसा है तो यह प्रदेश की राजनीति में बड़ा दांव माना जाएगा। लेकिन इस रणनीति की कीमत क्या होगी, यह आने वाला समय बताएगा।
कार्यक्रम में भारतीय जनता पार्टी का कोई प्रमुख चेहरा नजर नहीं आया। इससे यह संदेश भी गया कि जयस और कांग्रेस के कुछ नेताओं के बीच संवाद की रेखा खिंच चुकी है। कांग्रेस के पूर्व विधायकों की अनुपस्थिति और वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी ने यह संकेत दिया है कि पार्टी के भीतर मतभेद सतह पर आ चुके हैं।
भीमपुर का यह आयोजन प्रतिमा स्थापना या सांस्कृतिक उत्सव की कहानी नहीं है। यह जिले की राजनीति में बदलते समीकरणों, संभावित गठबंधनों और भीतरघात की परछाइयों का आईना बन चुका है। जिस जयस ने पांच सीटों पर कांग्रेस को रोका, उसी के मंच पर कांग्रेस के चुनिंदा चेहरों की मौजूदगी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले चुनावों से पहले सियासत की बिसात फिर से बिछाई जा रही है। सवाल यह है कि यह चाल किसके लिए मात साबित होगी और किसके लिए नई शुरुआत।
