Betul News:शराब ठेकेदारों का ‘अमृत काल’: मौत का खुला खेल मनमानी कीमतें,प्रशासन मौन !

शराब ठेकेदारों का ‘अमृत काल’: मौत का खुला खेल मनमानी कीमतें,प्रशासन मौन !

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बैतूल।विकास के इस अमृत काल में, जहाँ हर तरफ सुशासन की बयार बहने का दावा किया जा रहा है, वहीं कुछ ऐसे ‘स्वतंत्र’ क्षेत्र भी हैं जहाँ नियम-कानून की बातें सिर्फ किताबों और प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित रह गई हैं। हम बात कर रहे हैं शराब के ठेकों की, जहाँ ‘मनमर्ज़ी’ ही सबसे बड़ा कानून है और ‘जनता की सुनवाई’ एक दुर्लभ प्रजाति का जीव बन चुकी है।

मनमाने दामों के साथ साथ’मौत का खुला बाजार’

शराब के ठेकों पर सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य सूची का पालन करना एक भूला बिसरा सपना बन गया है। ऐसा लगता है कि शराब ठेकेदार स्वयं को ‘अर्थशास्त्र के नोबेल विजेता’ मान चुके हैं, जो अपनी मर्जी से कीमतों का निर्धारण करते हैं। 100 रुपये की बोतल 120 में, 500 रुपये की 600 में – यह कोई मोलभाव नहीं, यह शराब ठेकेदारों का ‘नया गणित’ है, जिसका सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ रहा है। कहने को तो हर दुकान पर मूल्य सूची लगी होनी चाहिए, लेकिन वह या तो इतनी ऊपर लगी होती है जहाँ आपकी गर्दन दर्द करने लगे, या इतनी धूमिल कि आपको चश्मा बदलवाना पड़े। यह ‘अंधेरे में तीर चलाने’ जैसा है, जहाँ निशाना हमेशा ग्राहक की जेब पर लगता है। वही शराब दुकान पर बिक रही शराब में मरी हुई माखियां कीड़े निकल रहे थे जिसे अंदाजा लगाया जा सकता है कि शहर में महंगी कीमतों के साथ साथ मौत का खुला खेल चल रहा है और प्रशासन मौन बैठ कर तमाशा देख रहा है!

जनसुनवाई: एक अदृश्य प्रक्रिया 

कहा जाता है कि प्रशासन जनता की समस्याओं को सुनने के लिए प्रतिबद्ध है। इसके लिए जनसुनवाई जैसे कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। लेकिन शराब के मनमाने दामों को लेकर शिकायत करने वाले ग्राहक को देखकर लगता है कि जनसुनवाई शायद किसी और ग्रह पर होती है। ठेकेदारों की मनमानी के खिलाफ शिकायत लेकर जाने वाले को अक्सर ‘ज्ञान’ दिया जाता है कि ‘शराब पीना ही क्यों है?’ या ‘हमने तो कुछ नहीं देखा’। ऐसा लगता है कि आबकारी विभाग ने अपनी आंखों पर ‘विकास की पट्टी’ बाँध ली है, जिससे उन्हें सिर्फ राजस्व दिखता है, जनता की परेशानी नहीं।

कलेक्टर की चेतावनी: ‘मानव बना बबूल’ और ठेकेदार का ‘मौन व्रत’

जब शिकायतें बढ़ती हैं, तो कभी-कभी कलेक्टर महोदय भी ‘चेतावनी’ का डंडा उठाते हैं। प्रेस में खबरें छपती हैं कि ‘मनमानी पर अंकुश लगेगा’, ‘ठेकेदारों पर सख्त कार्रवाई होगी’। इन चेतावनियों को सुनकर जनता को थोड़ी राहत मिलती है, लेकिन ठेकेदारों के लिए ये महज ‘अखबारी ज्ञान’ से ज्यादा कुछ नहीं। उनके लिए कलेक्टर की चेतावनी का मतलब है ‘माना बना बबूल’, यानी चेतावनी आती है और चली जाती है, उनका व्यापार तो अपनी गति से चलता रहता है। वे तो बबूल की तरह हैं, जिसे कोई चेतावनी काट नहीं सकती। मानो वे अपनी ‘मौन सहमति’ में कहते हैं, “हमें कौन रोकेगा?”

आबकारी विभाग की ‘मौन सहमति’:एक अलिखित समझौता?

इस पूरे खेल में सबसे दिलचस्प किरदार है आबकारी विभाग का। उनकी ‘मौन सहमति’ इस पूरे भ्रष्टाचार की रीढ़ है। ऐसा लगता है कि शराब ठेकेदारों और आबकारी विभाग के बीच एक ‘अलिखित समझौता’ हो गया है। ठेकेदार मनमानी करते हैं और आबकारी विभाग ‘मौन व्रत’ धारण कर लेता है। यह मौन इतना गहरा है कि न तो उन्हें मनमानी कीमतें दिखती हैं, न शिकायतों का अंबार। शायद उनका मानना है कि जब तक राजस्व आ रहा है, तब तक सब ठीक है। यह मौन ‘विकास’ का मौन है, जो कुछ खास लोगों की जेबें भरता है और आम जनता की जेबें खाली करता है।

अंततः: जनता के लिए ‘जाम’ और ठेकेदारों के लिए ‘पैगाम’

तो, अंत में स्थिति यह है कि जनता के लिए शराब का हर घूँट अब दोगुना महंगा पड़ रहा है, और ठेकेदारों के लिए यह ‘अमृत काल’ बन गया है। प्रशासन की चेतावनियाँ कागज़ों पर ही सिमट कर रह जाती हैं, जनसुनवाई एक ढकोसला है, और आबकारी विभाग की मौन सहमति इस पूरे खेल को और भी मजबूती प्रदान करती है। ऐसा लगता है कि इस ‘नये भारत’ में, शराब ठेकेदार ही असली ‘सरकार’ हैं, जिनके नियमों को कोई चुनौती नहीं दे सकता। तब तक, ग्राहक अपने मनमाने दामों पर जाम उठाते रहेंगे, और ठेकेदार अपने मुनाफे का पैगाम गाते रहेंगे।

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