Betul News:साहब! पत्रकारिता में कोई बड़ा-छोटा नहीं,!हर दिन कुछ नया सिखाती है ये कलम

साहब! पत्रकारिता में कोई बड़ा-छोटा नहीं,!हर दिन कुछ नया सिखाती है ये कलम

बैतूल। पत्रकारिता वो पेशा, जिसमें कलम की स्याही से लेकर सवालों की धार तक सबकी अपनी-अपनी कहानी है।लेकिन अफसोस, कभी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली पत्रकारिता आज अपने ही भीतर की दीवारों में दरारें लिए खड़ी है।जहाँ पहले स्याही सच लिखती थी, अब कई जगहों पर “वरिष्ठ” और कनिष्ठ के अहंकार की स्याही सूखने लगी है।कुछ लोगों ने साहबों की नजरों ने इस पेशे को “अनुभव” के नाम पर अहंकार” का मंच बना लिया है जबकि पत्रकारिता का असली अनुभव तो वही है जो हर दिन कुछ नया सीखने की ललक में जिए पत्रकारिता नौकरी नहीं, एक निरंतर सीखने वाली साधना है।हर रिपोर्ट, हर कैमरा शॉट, हर आवाज़ एक नई कक्षा है।
जो आज माइक संभाल रहा है, वही कल सुर्खियाँ लिखेगा।पर अफसोस, कुछ “साहब” भूल गए हैं कि यहां उम्र नहीं, दृष्टि मायने रखती है और कलम का वजन उसके शब्दों से तय होता है, पद से नहीं।पत्रकारिता में वरिष्ठ होने का अर्थ यह नहीं कि संवेदनशीलता खो दी जाए।आज जो ग्राउंड पर धूल फांक रहा है, वही असली पत्रकार है चाहे उसकी पहचान छोटी हो या बड़ी।जो जनता की आवाज़ सुनता है, वही पत्रकार है; बाकी तो बस कुर्सियों पर बैठे दर्शक हैं, जो हेडलाइन देखकर खुद को इतिहास मान लेते हैं। कुछ बड़े बैनर तले काम करने वाले लोग जो अधिकारियों के सामने नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं उनको इतनी बुद्धि होनी चाहिए कि जो साथी पत्रकार है उनको भी कम नहीं समझना चाहिए क्यों कि पत्रकारिता में न कोई राजा है न प्रजा।हर कोई विद्यार्थी है कोई जनता से सीखता है, कोई अपनी गलती से, कोई समाज से।यह पेशा अहंकार दिखाने का नहीं, सच बोलने का है। और सच वही बोल सकता है जो झुकता नहीं, बिकता नहीं, डरता नहीं।आज जरूरत इस बात की नहीं कि कौन वरिष्ठ है, बल्कि इस बात की है कि कौन सच्चा है।जो जनता की आवाज़ को सबसे नीचे तक सुनता है, वही सबसे बड़ा पत्रकार है।बाकी सब बस “कुर्सी संभाले बैठे पात्र” हैं जो भूल चुके हैं कि पत्रकारिता में सम्मान किसी पद से नहीं, जनता से मिलता है क्योंकि असली पत्रकार वही है जो हर दिन कुछ नया सीखता है और अपनी कलम से समाज के लिए कुछ नया छोड़ जाता है। लेकिन चंद बड़े बैनर तले काम करने वाले बुद्धि जीवी लोग अधिकारियों के सामने नीचा दिखाने में पीछे नहीं हटते इतना ही नहीं बुराई तो इनके मुख से ऐसे निकलेगी कि जैसे मानो फूल बरस रहे हो। और अधिकारी भी इनकी बातों में आकर बड़ा और छोटे करने में लग जाते हैं लेकिन अधिकारियों को समझना चाहिए कि इस पत्रकारिता में कोई बड़ा छोटा नहीं होता है सब अपनी अपनी जगह बात रखते हैं और कुर्सी हिलाने का दम भी अपनी कलम से लिखने का दम है।

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