Betul News:अध्याय 3 साहब का ट्रैक रिकॉर्ड जहां जाएं, वहां जुआ खिलाए जाए !थानेदारी कम, जुआ संयोजक ज़्यादा लगते हैं साहब!
साहब का ट्रैक रिकॉर्ड जहां जाएं, वहां जुआ खिलाए जाए !थानेदारी कम, जुआ संयोजक ज़्यादा लगते हैं साहब!

बैतूल :- शहर में एक ऐसे “कर्मठ” थाना प्रभारी की चर्चा जो जहां भी तैनात हुए, वहां ताश की गड्डियां पहले पहुंच गईं, और पत्ते चलने लगे – वो भी पूरे ठाठ से! साहब का ट्रैक रिकॉर्ड देख कर कोई कहेगा कि ये थाने चलाने नहीं, जुए के अड्डे सजाने आते हैं।सूत्र बताते हैं कि जिस भी थाने में साहब ने चप्पल उतारी, वहां के ‘शौकीनों’ को राहत की सांस मिल गई – अब न दबिश का डर, न डंडे का खटका! ऐसा लगता है मानो साहब के आने की खबर मिलते ही जुआरीयों ने “बैंड-बाजे के साथ स्वागत” कर लिया हो।
जमीन का झोल या जिम्मेदारी की ढील?
चर्चाओं में यह भी है कि साहब इन दिनों जमीन खरीदने की फिराक में हैं। अब जमीन चाहिए तो ‘व्यवस्था’ भी चाहिए – और इसके लिए शायद ‘खुली छूट’ की नीति अपनाई गई है। साहब को आते ही अड्डों को आशीर्वाद मिल जाता है – मानो कह रहे हों, “खेलो बेटा, कोई रोकने वाला नहीं!”
टिकते नहीं, चलते रहते हैं साहब!
वैसे इनके बारे मे जाता है कि साहब की पोस्टिंग कभी किसी थाने में तीन महीने से ज्यादा नहीं टिकती। अब इसे विभाग की ‘रणनीति’ कहें या जनता की राहत व्यवस्था – लेकिन जहां भी ये साहब गए, पीछे ढेरों कहानियाँ छोड़ आए। कुछ सिपाही तो कहते हैं – “साहब आए थे, तीन महीने में जुए का सेंटर इंटरनेशनल बना गए! शहर में अब तो लोगों के बीच ये कहावत चल पड़ी है -“जहां साहब की गाड़ी रुके, वहां ताश की गड्डी खुले!” सबसे मज़ेदार बात ये है कि पूरे प्रशासन ने जैसे आँखों पर पट्टी बांध रखी हो।
नया थाना, नए ठिकाने?
अब साहब को एक नए थाने की कमान मिली है। जनता सोच में है कि क्या अब उस इलाके की किस्मत ‘खुलने’ वाली है? या फिर वहां के जुआरी भी स्वागत को तैयार बैठे हैं? थाना प्रभारी साहब जहां तैनात होते हैं, वहां कानून कम और लॉटरी ज्यादा चलती है। शहर को सुरक्षा नहीं, किस्मत आजमाने की छूट मिलती है।अब देखना यह है कि “साहब का अगला स्टॉप कौन सा अड्डा बनता है?”
