Betul News:कलेक्टर के आदेश ने बढ़ाई कागजी कवायद? एक बच्चे के लिए दो-दो जन्म प्रमाण पत्र, सरकारी धन और समय की हो रही बर्बादी!

तत्काल प्रमाण पत्र देने की व्यवस्था बनी दोहरी प्रक्रिया का कारण, कर्मचारी भी परेशान और व्यवस्था पर उठ रहे सवाल

कलेक्टर के आदेश ने बढ़ाई कागजी कवायद? एक बच्चे के लिए दो-दो जन्म प्रमाण पत्र, सरकारी धन और समय की हो रही बर्बादी!

तत्काल प्रमाण पत्र देने की व्यवस्था बनी दोहरी प्रक्रिया का कारण, कर्मचारी भी परेशान और व्यवस्था पर उठ रहे सवाल

 

बैतूल। हिन्दू सनातन परंपरा में जन्म के बाद नामकरण संस्कार को 16 प्रमुख संस्कारों में स्थान दिया गया है। शास्त्रों के अनुसार शुभ मुहूर्त में परिवार और आचार्य की उपस्थिति में शिशु का नाम रखा जाता है। ऐसे में जन्म के तुरंत बाद बिना नाम का जन्म प्रमाण पत्र जारी करने की वर्तमान व्यवस्था अब सवालों के घेरे में है। सूत्रों के अनुसार, सुविधा के उद्देश्य से शुरू की गई यह प्रक्रिया कर्मचारियों पर अतिरिक्त बोझ डाल रही है और सरकारी संसाधनों की दोहरी खपत का कारण बन रही है।जानकारी के अनुसार, जिला अस्पताल में जन्म के तुरंत बाद बिना नाम का जन्म प्रमाण पत्र माता-पिता को सौंप दिया जाता है। इसके बाद जब परिवार नामकरण संस्कार के बाद बच्चे का नाम तय करता है, तब उसी बच्चे के लिए नाम सहित नया जन्म प्रमाण पत्र बनाने की पूरी प्रक्रिया दोबारा करनी पड़ती है। पहले जारी किया गया प्रमाण पत्र रिकॉर्ड में जमा होकर अनुपयोगी हो जाता है।सूत्रों के अनुसार, व्यवस्था का उद्देश्य भले ही माता-पिता को तत्काल सुविधा देना रहा हो, लेकिन इसके क्रियान्वयन ने कर्मचारियों पर अतिरिक्त बोझ डाल दिया है और सरकारी संसाधनों की अनावश्यक खपत होने की बात सामने आ रही है जानकारी के अनुसार, जिला अस्पताल में जन्म के तुरंत बाद बिना नाम का जन्म प्रमाण पत्र जारी कर माता-पिता को सौंप दिया जाता है। बाद में जब बच्चे का नाम तय होता है, तब उसी बच्चे के लिए नाम सहित नया जन्म प्रमाण पत्र बनाने की पूरी प्रक्रिया दोबारा अपनानी पड़ती है। इस दौरान पहले जारी किया गया प्रमाण पत्र वापस लेकर रिकॉर्ड में जमा कर दिया जाता है, जिसका आगे कोई उपयोग नहीं रह जाता। सूत्रों का दावा है कि पहले जहां एक बच्चे के लिए केवल एक जन्म प्रमाण पत्र तैयार किया जाता था, वहीं अब एक ही प्रकरण में दो बार दस्तावेज तैयार करने पड़ रहे हैं। इससे कर्मचारियों का समय तो लग ही रहा है, साथ ही कागज, प्रिंटिंग और अन्य शासकीय संसाधनों पर भी अतिरिक्त खर्च होने की बात कही जा रही है। कर्मचारियों का कहना है कि दोहरी प्रक्रिया के कारण अन्य जरूरी काम भी प्रभावित हो रहे हैं। पहले एक-दो दिन में पूरी होने वाली प्रक्रिया अब कई मामलों में अधिक समय ले रही है। पहले ऐसे में जिस व्यवस्था को सुविधा के लिए लागू किया गया था, वही अब व्यवहारिक कठिनाइयों का कारण बनती दिखाई दे रही है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि अंततः नाम सहित नया जन्म प्रमाण पत्र ही उपयोग में आना है, तो बिना नाम वाला प्रमाण पत्र तत्काल जारी करने की आवश्यकता क्यू है? क्या इस व्यवस्था का कोई वैकल्पिक और अधिक व्यावहारिक मॉडल तैयार नहीं किया जा सकता था, जिससे न कर्मचारियों पर अतिरिक्त बोझ बढ़े और न ही सरकारी धन व संसाधनों की अनावश्यक खपत हो? निगाहें जिला प्रशासन पर हैं। क्या इस व्यवस्था में सुधार कर ऐसी प्रणाली विकसित की जाएगी, जिससे माता-पिता को सुविधा भी मिले, कर्मचारियों पर अतिरिक्त बोझ भी न बढ़े और सरकारी धन व संसाधनों की अनावश्यक बर्बादी भी रोकी जा सके?

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