Betul News:व्यूज़ की भूख में सम्मान भी हल्का पड़ गया! कुछ सोशल मीडिया स्टार खुद को एसपी का बचपन का दोस्त बताने लगे
सम्मान का मंच मिला था समाज को संदेश देने के लिए, लेकिन कुछ लोगों ने उसे 'कंटेंट' बनाने का साधन समझ लिया
व्यूज़ की भूख में सम्मान भी हल्का पड़ गया! कुछ सोशल मीडिया स्टार खुद को एसपी का बचपन का दोस्त बताने लगे
सम्मान का मंच मिला था समाज को संदेश देने के लिए, लेकिन कुछ लोगों ने उसे ‘कंटेंट’ बनाने का साधन समझ लिया

बैतूल। सोशल मीडिया का दौर है। आजकल कुछ लोगों के लिए कैमरा ऑन होते ही जिम्मेदारी ऑफ हो जाती है। कुछ दिन पहले बैतूल पुलिस ने नशे से दूरी अभियान के तहत सोशल मीडिया क्रिएटर्स को इसलिए सम्मानित किया था कि वे युवाओं तक सकारात्मक संदेश पहुंचाएं। लेकिन लगता है कुछ लोगों ने सम्मान को जिम्मेदारी नहीं, बल्कि “वीआईपी पहचान का लाइसेंस” समझ लिया सम्मान समारोह खत्म हुआ नहीं कि सोशल मीडिया पर वीडियो शुरू हो गए। कोई कहने लगा एसपी साहब तो हमारे बचपन के दोस्त हैं।” कोई बोला रोज साथ बैठते हैं।किसी ने “साथ में चाय” की कहानी सुना दी। सवाल यह है कि यह हास्य था या फिर लाइक्स और व्यूज़ के लिए वर्दी की गरिमा को हल्का दिखाने की कोशिश?आजकल कुछ लोगों की पूरी पत्रकारिता और इन्फ्लुएंसरी एक सेल्फी, एक सम्मान पत्र और दो रीलों पर टिकी दिखाई देती है। मंच पर सम्मान मिलते ही ऐसा व्यवहार शुरू हो जाता है, मानो जिले का पूरा प्रशासन अब निजी मित्र मंडली का हिस्सा हो।
पुलिस ने सम्मान इसलिए दिया था कि समाज में नशे के खिलाफ जागरूकता फैले। लेकिन यदि उसी सम्मान को आधार बनाकर अधिकारी की छवि पर हल्के-फुल्के वीडियो बनाए जाएं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि सम्मान का मूल्य समझा भी गया या नहीं? कुछ लोगों को सम्मान नहीं, पहचान का शॉर्टकट चाहिए। सेवा नहीं, सिर्फ सोशल मीडिया का शोर चाहिए। याद रखिए, सम्मान का असली वजन फ्रेम में लगी तस्वीर से नहीं, सम्मान पाने वाले के आचरण से तय होता है। यदि सम्मान के अगले ही दिन उसका उपयोग निजी प्रभाव दिखाने या मजाकिया प्रदर्शन के लिए होने लगे, तो यह सम्मान देने वाली संस्था और समाज दोनों के प्रति गंभीरता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।व्यूज़ बढ़ाने की होड़ में मर्यादा घटने लगे, तो ताली बजाने वाले बहुत मिल जाते हैं, लेकिन सम्मान देने वाले हाथ धीरे-धीरे पीछे हट जाते हैं।
