Betul Crime: बैतूल में ‘चाकू संस्कृति’ का उदय? तीन दिन में तीन वारदात, कानून देख रहा है या सो रहा है!
बैतूल में ‘चाकू संस्कृति’ का उदय? तीन दिन में तीन वारदात, कानून देख रहा है या सो रहा है!

बैतूल। कभी शहर की पहचान शांति और सौहार्द से होती थी, लेकिन इन दिनों ऐसा लग रहा है कि कुछ लोगों ने बहस, बातचीत और समझाइश जैसे पुराने तरीकों को अलविदा कहकर सीधे चाकू को से वार करके झगड़े को खत्म करने का माध्यम बना लिया है। हालत यह है कि पिछले तीन दिनों में शहर में तीन चाकूबाजी की घटनाएं सामने आ चुकी हैं और हर नई घटना पिछले सवालों को और गहरा कर रही है।सोनाघाटी में हुए हमले ने पूरे शहर को झकझोर दिया। एक युवक पर ऐसा हमला हुआ कि उसकी हालत गंभीर हो गई। घटना ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर मामूली विवादों में जान लेने और जान जोखिम में डालने की मानसिकता इतनी तेजी से कैसे बढ़ रही है।उधर कॉलेज रोड, जहां छात्र अपने भविष्य की तैयारी करने जाते हैं, वहां भी मारपीट उसके बाद सोशल मीडिया पर पोस्ट कर पुलिस को ही चुनौती देदी अब शायद किताबों के साथ लोगों को आसपास का माहौल भी पढ़ना पड़ेगा। अभिभावक बच्चों को पढ़ने भेजें या पहले उनकी सुरक्षित वापसी की चिंता करें, यह सवाल भी उठने लगा है।और जब लोगों ने सोचा कि दिन भर की घटनाएं काफी थीं, तब रात में एक और चाकूबाजी की खबर आ गई। ऐसा लग रहा है मानो शहर में कुछ लोगों ने दिन और रात की शिफ्ट बांट रखी हो ताकि अपराध का ग्राफ चौबीसों घंटे सक्रिय रहे।इन घटनाओं के बाद सबसे दिलचस्प बात यह है कि हर वारदात के बाद वही पुराने सवाल खड़े होते हैं और फिर धीरे-धीरे फाइलों की धूल में दब जाते हैं। पुलिस गश्त बढ़ाने की बात होती है, सख्ती की बात होती है, अपराधियों पर अंकुश की बात होती है, लेकिन चाकू चलाने वाले को शायद मालूम है कि पुलिस कुछ नहीं करेगी और ऐसी घटनाओं को गंभीरता से नहीं लेते।जनता भी अब हैरान है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या शहर में कानून का डर कम हुआ है या अपराधियों का आत्मविश्वास जरूरत से ज्यादा बढ़ गया है? क्या असामाजिक तत्वों को यह भरोसा हो गया है कि वारदात के बाद कुछ दिन चर्चा होगी और फिर सब सामान्य हो जाएगा।सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर तीन दिन में तीन चाकूबाजी की घटनाएं केवल संयोग हैं या फिर यह संकेत हैं कि शहर में अपराधियों का मनोबल और कानून का प्रभाव विपरीत दिशा में चल रहे हैं। यही रफ्तार रही तो कहीं ऐसा न हो कि शहर की पहचान विकास, शिक्षा और व्यापार से कम और चाकूबाजी की घटनाओं से ज्यादा होने लगे। तब सवाल यह नहीं होगा कि चाकू क्यों चला, बल्कि यह होगा कि आज कहां चला?
