poisonous liquor:जहरीली शराब की लाशों पर कैसा विकास?

राजस्व सरकार का, मुनाफा माफिया का और मौत गरीब की जिम्मेदार कौन?

जहरीली शराब की लाशों पर कैसा विकास?

राजस्व सरकार का, मुनाफा माफिया का और मौत गरीब की जिम्मेदार कौन?

बैतूल। वैसे तो भारत देश में कही भी सभ्य समाज में शराब पीकर मरने वालों के प्रति दिली संवेदनाएं अक्सर उतनी मुखर नहीं होतीं, जितनी किसी अन्य हादसे में दिखाई देती हैं। शायद इसलिए कि लोग मौत से पहले ही उस व्यक्ति को उसकी शराब की आदत के आधार पर दोषी मान लेते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी की गलती उसकी मौत को कम दर्दनाक बना देती है? जी हां बात कर रहे हैं मध्य प्रदेश के सागर जिले के बंडा क्षेत्र में संदिग्ध जहरीली शराब ने कई परिवारों को उजाड़ दिया। 11 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है और दर्जनों लोग अस्पतालों में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे हैं। घटना के बाद प्रशासन ने जांच शुरू की, कार्रवाई हुई और आबकारी विभाग के अधिकारियों पर भी कार्रवाई की गई। वैसे तो सरकारों के लिए शराब लंबे समय से राजस्व का बड़ा स्रोत रही है। शराब की बिक्री से मिलने वाला पैसा विकास योजनाओं, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरी जनकल्याणकारी योजनाओं के बजट में जाता है। तर्क यह दिया जाता है कि शराब से मिलने वाला राजस्व सरकारी खजाने को मजबूत करता है।लेकिन जब यही शराब जहरीली होकर किसी परिवार का कमाने वाला सदस्य छीन लेती है, तब सवाल सिर्फ एक व्यक्ति की मौत का नहीं रहता सवाल उस व्यवस्था की जिम्मेदारी का भी होता है, जिसने शराब के कारोबार से राजस्व तो लिया, लेकिन उसकी गुणवत्ता और अवैध बिक्री पर निगरानी कितनी प्रभावी रखी? विकास जरूरी है, राजस्व भी जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास किस काम का जिसके आंकड़ों में करोड़ों रुपये का राजस्व दिखाई दे और दूसरी तरफ लोगो के घरों में मातम पसरा हो? जहरीली शराब सिर्फ एक बोतल में मौजूद जहर नहीं है। यह प्रशासनिक लापरवाही, अवैध कारोबार, कमजोर निगरानी और सामाजिक उदासीनता का मिला-जुला परिणाम बन सकती है।सबसे बड़ा सवाल यही है सरकारी खजाने में जमा होने वाला राजस्व आखिर किस कीमत पर स्वीकार्य है? सरकार को शराब से राजस्व चाहिए तो उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि शराब की बिक्री कानून के दायरे में हो, अवैध शराब का कारोबार जड़ से खत्म हो और किसी की जान महज मुनाफे और लापरवाही के बीच कुचलकर न रह जाए। क्योंकि विकास की असली पहचान सिर्फ बड़ी-बड़ी इमारतें, चौड़ी सड़कें और बढ़ता राजस्व नहीं है। असली विकास वह है, जिसमें किसी गरीब मां को अपने बेटे की लाश के सामने यह सवाल न करना पड़े आखिर उसकी जान की कीमत कितनी थी?जहरीली शराब से होने वाली हर मौत हमें आईना दिखाती है। सवाल यह है कि हम उस आईने में अपना चेहरा देखने की हिम्मत कब करेंगे? खैर अब सरकार वही पुराना राग गाएगी लापरवाही करने वाले को किसी भी हाल में छोड़ा नहीं जाएगा कड़ी से कड़ी कार्रवाई करेंगे लेकिन क्या वास्तव में ऐसा होता है। नेता और अधिकारी इसी सिस्टम का हिस्सा हैं। अगर व्यवस्था में कहीं लापरवाही हुई है तो सिर्फ कुछ लोगों को निलंबित कर देना पर्याप्त नहीं। यह भी देखना होगा कि जिम्मेदारी किस स्तर पर तय हुई और ऐसी घटना दोबारा न हो, इसके लिए बदला क्या?क्योंकि कुछ दिन की कार्रवाई से सुर्खियां तो बदली जा सकती हैं, लेकिन उजड़े परिवारों की जिंदगी वापस नहीं लाई जा सकती।

You might also like
Leave A Reply

Your email address will not be published.