नशा जब इंसान खुद अपना दुश्मन बन जाता है
नशा कैसे इंसान की समझ, संयम और जिम्मेदारी को खत्म कर देता है
नशा जब इंसान खुद अपना दुश्मन बन जाता है
नशा कैसे इंसान की समझ, संयम और जिम्मेदारी को खत्म कर देता है

बैतूल नशा इंसान से उसकी सोच, संयम और सामाजिक जिम्मेदारी छीन लेता है और उसे पल भर में खुद के साथ-साथ समाज के लिए भी खतरा बना देता है। सोमवार शाम बैतूल की एक घटना कोई साधारण अपराध नहीं थी, बल्कि समाज के सामने खड़ा एक आईना थी। नशे में धुत एक युवक ने सार्वजनिक स्थान पर हंगामा किया और अपनी ही बाइक को आग के हवाले कर दिया। यह दृश्य सिर्फ आग और धुएं का नहीं था, बल्कि उस सोच के जलने का था, जो नशा इंसान से छीन लेता है।नशा सबसे पहले इंसान की समझ पर वार करता है। सही-गलत का फर्क मिट जाता है, नियम दुश्मन लगने लगते हैं और चेतावनी अपमान प्रतीत होती है। फिर बारी आती है संयम की जो नशे में सबसे पहले टूटता है। शब्द गाली बन जाते हैं, बहस हंगामे में बदल जाती है और गुस्सा हिंसा का रूप ले लेता है।सबसे खतरनाक असर जिम्मेदारी का खत्म हो जाना है। नशे में व्यक्ति न खुद की परवाह करता है, न दूसरों की। उसे यह एहसास ही नहीं रहता कि उसकी एक हरकत कितने लोगों की जान खतरे में डाल सकती है। बैतूल की घटना में गनीमत रही कि आग किसी और वाहन या व्यक्ति तक नहीं पहुंची, वरना एक छोटी-सी सनक बड़ी त्रासदी बन सकती थी।यह सवाल सिर्फ एक युवक का नहीं है। यह सवाल हमारे समाज का है, हमारी व्यवस्था का है। खुलेआम नशा, लचर निगरानी और ‘चलता है’ की मानसिकता ऐसे हादसों को जन्म देती है। पुलिस की कार्रवाई जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है सामाजिक चेतना और आत्मसंयम। युवा वर्ग के लोग हो या फिर ओ हर युक्ति जो नशे को शौक समझने की भूल करता है और अब वही नशा भारी पड़ जाता है। यह शौक नहीं, धीमा ज़हर है जो इंसान की सोच, उसका भविष्य और समाज की शांति को भीतर से खोखला कर देता है।आज जरूरत है सख्त कानूनों के साथ-साथ सख्त सामाजिक संदेश की जागरूकता की नशा सिर्फ खुद को नहीं जलाता, यह पूरे समाज को आग के हवाले कर देता है।अगर समय रहते नहीं संभले, तो अगली आग किसी बाइक की नहीं, किसी जिंदगी की भी हो सकती है।
