Betul News:काम रुका तो खबर शुरू, काम बन गया तो सब कुछ दुरुस्त! जिले में चर्चा का विषय बनी ‘मौसमी पत्रकारिता

जब अधिकारी ने नियम बताए तो खबरें बरसने लगीं

काम रुका तो खबर शुरू, काम बन गया तो सब कुछ दुरुस्त! जिले में चर्चा का विषय बनी ‘मौसमी पत्रकारिता

जब अधिकारी ने नियम बताए तो खबरें बरसने लगीं

बैतूल। पत्रकारिता को कभी मिशन कहा जाता था, फिर यह पेशा बनी और अब कुछ लोगों ने इसे निजी हितों का प्रोजेक्ट बना दिया है। जिले में इन दिनों एक नई तरह की पत्रकारिता चर्चा में है, जहां खबर का जन्म किसी जनसमस्या से नहीं, बल्कि निजी असंतोष से होता है।कहते हैं कि पत्रकार का काम सत्ता से सवाल पूछना है, लेकिन यहां कुछ लोगों का सिद्धांत कुछ अलग ही नजर आता है। जब तक अधिकारी मुस्कुराकर मिलते रहें, फोन उठाते रहें और मनचाहे काम होते रहें, तब तक वे ईमानदारी और कार्यकुशलता की प्रतिमूर्ति बने रहते हैं। लेकिन जैसे ही किसी ने नियम-कायदे का हवाला दे दिया, उसी दिन से उसके खिलाफ खबरों का विशेष अभियान शुरू हो जाता है ।सबसे दिलचस्प बात यह है कि ऐसे लोगों की कलम जनता की समस्याओं पर अक्सर आराम फरमाती दिखाई देती है। गांव की टूटी सड़क, अस्पतालों की अव्यवस्था, पेयजल संकट, शिक्षा की बदहाली और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे शायद उनकी प्राथमिकता सूची में बहुत नीचे होते हैं। लेकिन यदि कोई व्यक्तिगत समीकरण बिगड़ जाए, तो फिर खबरें ऐसी प्रकाशित होती हैं मानो जिले की सारी समस्याओं की जड़ वही एक व्यक्ति हो।आजकल जिले में कुछ लोग एक महिला अधिकारी के लिए प्री प्लानिंग खबरें प्रकाशित कर रहे हैं। हद तो तब हो गई जब उस महिला अधिकारी के खिलाफ एक पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल कर दी ओर अधिकारियों से शिकायत भी कर दी लेकिन इसके पीछे की उनकी मनसा अधिकारी बखूबी जानते है उनकी खबरों का संबंध तथ्यों से कम और अपने निजी हित के लिए ज्यादा होता जा रहा है। संबंध अच्छे तो सब कुछ उत्कृष्ट, संबंध बिगड़े तो सब कुछ संदिग्ध। ऐसे में खबरों की निष्पक्षता पर नहीं, बल्कि उनके पीछे की मंशा पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है पत्रकारिता का अर्थ किसी अधिकारी का गुणगान करना नहीं है, लेकिन उसका अर्थ यह भी नहीं कि व्यक्तिगत नाराजगी को जनहित का चोला पहनाकर परोसा जाए। लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका प्रहरी की है, शिकारी की नहीं। प्रहरी व्यवस्था की कमियों पर नजर रखता है, जबकि शिकारी अपने निशाने तलाशता है दुर्भाग्य यह है कि कुछ लोगों ने आलोचना और बदले की भावना के बीच की रेखा को धुंधला कर दिया है। परिणाम यह है कि वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और व्यक्तिगत लड़ाइयां सुर्खियां बन जाती हैं।जनता सब देख रही है। उसे यह समझने में देर नहीं लगती कि कौन सच के लिए लड़ रहा है और कौन अपने स्वार्थ के लिए। खबरों की चमक कुछ समय के लिए भ्रम पैदा कर सकती है, लेकिन सत्य की रोशनी अंतत सब कुछ स्पष्ट कर देती है।पत्रकारिता की असली ताकत दबाव बनाने में नहीं, बल्कि विश्वास बनाने में होती है। कलम जब जनहित के लिए चलती है तो इतिहास बनाती है, लेकिन जब निजी हितों के लिए चलती है तो केवल चर्चाओं और सवालों का विषय बनकर रह जाती है।इस लिए अनोखा सच न्यूज सच दिखता है।

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