Betul News:टक्कर छोटी, सियासत बड़ी  मुलताई में मामूली झगड़े को हिंसक रूप देकर भड़काया बड़ा खेल तो नहीं!

पहले मारा और फिर की राजनीति और…बात सियासत तक पहुँच गई मुलताई में हादसे से हंगामा किसने करवाया?”

टक्कर छोटी, सियासत बड़ी  मुलताई में मामूली झगड़े को हिंसक रूप देकर भड़काया बड़ा खेल तो नहीं!

पहले मारा और फिर की राजनीति और…बात सियासत तक पहुँच गई मुलताई में हादसे से हंगामा किसने करवाया?”

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मुलताई। न मेरा है न तेरा है ये हिन्दुस्तान सबका है।नहीं समझी गई ये बात तो नुकसान सबका है। आलोचना और घृणा में कितना फ़र्क है। आलोचना वह रास्ता है जहाँ सुधार की भावना हो घृणा वह ज़हर है जहाँ केवल अपमान और नफ़रत पनपती है। लोकतंत्र आलोचना से मज़बूत होता है बहस, सवाल और जवाबदेही इसकी धमनियाँ हैं। पर जब नफ़रत कहर बरपाती है, तो वही लोकतंत्र भीतर से खोखला हो जाता है। क्या एक मामूली झगड़ा, जिसे बात वहीं खत्म हो जानी चाहिए थी, उसने अचानक बड़े दायरे की राजनीति को जन्म दे दिया। चार-पाँच लोगों तक की बात थी और उनके बीच ही विवाद हुआ, मगर अब तीन दर्जन के लगभग लोगों को निशाना बनाया जा रहा ।चोरी भी, सीना जोरी भी!जिसे सड़क हादसे के बाद खत्म हो जाना था, वही मामला अब सियासत के शतरंज पर मोहरा बन चुका है।

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अनोखा सच ने जब कहा था सच्चाई दिखाई जाएगी”, तब यह महज़ दावा नहीं था, ज़िम्मेदारी थी।और अब जब सच्चाई सामने आ रही है, तो कई चेहरों की नक़ाब उतर रहा है।दरअसल, मुलताई में जो हुआ, वह एक साधारण बाइक टक्कर थी न कोई गाड़ी जली, न कोई दुकान टूटी। लेकिन स्कूल पढ़ने वाले बच्चे के साथ धर्म और जाती लाकर दो लोगों के विवाद को हिन्दू धर्म से जोड़ कर कहानी ऐसी लिखी गई जैसे शहर में दंगा हो गया!एक ओर कहा गया हमारे प्रचारक पर हमला हुआ। लेकिन वही हिन्दू नेता दंगे कर रहे आग लगा दी, मारपीट कर रहे तो दूसरी ओर आवाज़ उठी हम पर झूठा आरोप लगाया जा रहा है और इस बीच… सच फिर कुचल दिया गया।सूत्र बताते हैं कि पूरा विवाद RSS के जिला प्रचारक शिशुपाल यादव और कुछ युवकों के बीच सड़क पर हुए मामूली झगड़े से शुरू हुआ।बात वहीं खत्म हो सकती थी पर नहीं! पर बात बढ़ाई गई, भावनाएँ भड़काईं गईं, और देखते-देखते मामला धर्म और जाति के रंग में रंग दिया गया।अब बड़ा सवाल यही है जब सब शांत हो सकता था, तो आग क्यों लगाई गई?और ये आग किसके हित में जलायी गई? जवाब राजनीति के गलियारों में छिपा है।घटना के बाद कई “बड़े-बड़े” चेहरे कूद पड़े किसी ने इसे “हिंदू बनाम मुस्लिम बताया, तो किसी ने “राष्ट्रभक्त बनाम अपराधी” की पटकथा लिख दी।सच तो यह है कि यह वही पुराना खेल है पहले माहौल बिगाड़ो, फिर बयान दो, जरा सोचिए जब बैतूल अभी भी कफ सिरप कांड में बच्चों की मौत पर जवाब मांग रहा था,तभी अचानक मुलताई में सांप्रदायिक धुआँ उठता है।क्या यह महज़ संयोग है, या एजेंडे की आँच? क्या बच्चों की मौत की चर्चा दबाने के लिए समाज की आग भड़काई गई?यह सवाल अब जनता पूछ रही है और जवाब भी वही तय करेगी।

अनोखा सच का वादा आज भी वही है हम दिखाएँगे घटना की तह, न कि सत्ता की राह, क्यों कि मैं सत्य का प्रसार हूँ मैं पत्रकार हूँ।क्योंकि सच वही नहीं जो मंच से बोला जाए सच वो है जो सड़क पर दिखाई दे।

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